Saturday, January 22, 2011

फांसी



  जिला अस्पताल में पोस्टमार्टम के दौरान मृतक किसान के परिजन एवं (इंसेट में) मृतक दाऊ लोधी।














29 jan ko chaphi report
   किसान ने फांसी लगाई
भोपाल। रातीबड़ के एक गांव के किसान ने शुक्रवार को सर्वे और कर्ज के टेंशन में फांसी लगाकर खुदकुशी कर ली। रातीबड़ स्थित ग्राम सेमरी निवासी किसान पूरन सिंह अहिरवार (45) की गांव में दो एकड़ जमीन है। उनके दो बेटे दीपक (16) और सूरज (14) क्रमश: नौवीं व सातवीं कक्षा में पढ़ते हैं। पूरन ने शुक्रवार सुबह सात बजे फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। मृतक की पत्नी शीला बाई ने बताया कि पाला से उनकी चना और गेहूं की फसल नष्ट हो गई थी।

पटवारी द्वारा इसका सर्वे नहीं किए जाने से वह परेशान था। इसके चलते पिछले एक महीने से पूरन नेहरू नगर में मजदूरी कर रहा था। पूरन ने परिवार का भरण-पोषण करने के लिए पड़ोसी से एक बोरा गेहूं समेत नकदी भी उधार ली थी। परिजन ने बताया कि पूरन ने कर्ज व फसल नष्ट होने से तंग आकर खुदकुशी की है। इस मामले में थाना प्रभारी एचएस पांडे ने बताया कि पुलिस मर्ग कायम कर मामले की जांच कर रही है। प्राथमिक जांच में सामने आया है कि बीती रात पूरन शराब पीकर घर पहुंचा था। पत्नी द्वारा दरवाजा नहीं खोलने पर उसने फांसी लगाकर खुदकुशी कर ली।
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फिर चार किसानों पर मंडराई मौत
पीपुल्स संवाददाता, टीकमगढ़/सीहोर/सागर
पाले से खराब फसल से चिंतित किसानों की आत्महत्याओं का दौर जारी है। सीहोर, टीकमगढ़ और सागर में किसानों ने जान देने का प्रयास किया, जिसमें एक की मौत हो गई, जबकि दो की हालत गंभीर बताई जाती है।
टीकगमढ़ के कुडीला थाना अंतर्गत ग्राम हृदयनगर के ग्रामवासी 26 वर्षीय किसान दाऊ लोधी ने कीटनाशक की दवा का सेवन कर लिया। उसकी चार बेटियां हैं, जिनमें से एक तो सिर्फ 6 माह की है। ग्रामवासियों के अनुसार पर उसने साहूकारों से ब्याज पर तीस हजार रुपए एवं सहकारी समिति से पच्चीस हजार रुपए का कर्ज लिया था। फसल से बीज की लागत भी नहीं निकल रही थी।  ग्रामीणों ने बताया कि पिछले काफी दिनों से दाऊ अपनी फसल और बढ़ते कर्ज व ब्याज के चलते परेशान था और इसी वजह से उसने कीटनाशक पिया। सीहोर जिले की नसरुल्लागंज तहसील के ग्राम इटावा के रहने वाले गंगाराम ने भी जहर पीकर जान देने की कोशिश की।
उधर, सागर की देवरी तहसील में एक किसान ने भी पाले की वजह से बरबाद हुई फसल के चलते जान देने का प्रयास किया।

28 jan ki report peoples
सदमे से किसान की मौत
शमशाबाद/विदिशा। जिले में सदमे से एक किसान की और मौत हो गई। कर्ज के  बोझ तले इस किसान की तुअर फसल पाले से बर्बाद हो गई थी। जानकारी के अनुसार रमपुरा जागीर निवासी 50 वर्षीय अमरचंद पिता सुंदरलाल साहू के पास 17 बीघा जमीन है। उसने 15 बीघा में तुअर की फसल बोई थी। पांच घंटा थ्रेसर चलाने के बाद मात्र तीन बोरा ही तुअर निकली। मंगलवार को अमरचंद यह तुअर बेचने शमशाबाद मंडी गया था और उसी शाम वह घर लौटा और उसे घबराहट होने लगी। परिवार वाले किसान को जीप से भोपाल लेकर निकले, जहां उसकी रास्ते में ही मौत हो गई। मृतक के बड़े लड़के ने बताया कि पिता पर डेढ़ लाख का कर्ज भी है। उसकी मां पिछले तीन-चार साल से बीमार
चल रही है।

भोपाल के एक निजी अस्पताल के डाक्टरों ने अमरचंद की मौत का कारण हार्ट अटैक बताया है।

 दो किसानों ने लगाई फांसी
22 jan ki report bhaskar

abhi tak kitni gayi jane
दमोह 3

छतरपुर 2

सीहोर 2

छिंदवाड़ा 1

नरसिंहपुर 1

विदिशा 1

बर्बाद फसल के सदमे से गई तीसरे की जान

भास्कर न्यूज & छतरपुर
प्रदेश में शुक्रवार को छतरपुर जिले के दो किसानों ने फांसी लगा ली, वहीं विदिशा जिले में एक की बर्बाद फसल के सदमे से मौत हो गई। दमोह जिले के एक किसान की पत्नी ने कीटनाशक पीकर आत्महत्या का प्रयास किया।

छतरपुर जिले के ग्राम पंचायत महेबा के पुरवा गांव का किसान लखनलाल कुशवाहा (40) का शव उसी के खेत पर एक पेड़ से लटका हुआ मिला। उसके भाई धरमदास एवं गांव वालों ने बताया लखन के खेत में तुअर की फसल बर्बाद हो गई थी, वहीं उसे बीमारी ने भी घेर लिया थी। वह कर्ज में डूब गया था। उधार वापसी के लिए उसपर दबाव बढ़ता जा रहा था। उसकी दो बेटियां हैं, जिनकी शादी को लेकर भी वह परेशान था। मामले में थाना प्रभारी ओरछा रोड एनएस बैस का कहना है कि परिवारजनों ने पुलिस को दिए बयानों में फसल खराब होने के कारण आत्महत्या करना बताया है।

इसी तरह नाथनपुरवा गांव में भी एक किसान कुंजीलाल ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। ग्रामीणों के अनुसार कुंजीलाल फसल खराब होने से परेशान था। ईशानगर थाना प्रभारी एएसआई एसएस खान का कहना है कि मृतक की पत्नी ने उन्हें बताया है कि उसके परिवार पर करीब 3 लाख रु का कर्ज था। इस मामले कलेक्टर ई. रमेश कुमार ने बताया कि कुंजीलाल पेश से कारीगर था। उसने हाल ही में एक प्लाट भी खरीदा था। मैंने एसडीएम और तहसीलदार को मामले की जांच आदेश दिए हैं। लखनलाल की आत्महत्या के कारणों की भी जांच की जा रही है।

Thursday, January 20, 2011

मैं पहुंचा खेतों तक

  ग्राम कलारबांकी के एक खेत में चौपट हुई तुअर की फसल


  खेतों से खरपतवार उखाड़ता एक किसान


  ग्राम कलारबांकी के एक खेत में चौपट हुई तुअर की फसल

  आइए तस्वीरों में आपको दिखाते हैं खेती और खेतों के हाल  कहां फसल अच्छी है और कौन किसान पूरी तरह लुट गया है। ये खेत हैं सिवनी जिले के ग्राम बीसावाड़ी और कलारबांकी के। विगत माह गिरे पाले(3 डिग्री से. से नीचे तापमान) ने जहां किसानों की फसल को खराब कर दिया वहीं हम उन किसानों से मिले जिन्होंने बताया कि उनकी फसल बच गई है क्योंकि वहीं फसल खराब हुई है। जो बहुत पहले ही बो  दी गई थी और जिसकी बालियां निकल गर्इं थीं। इस क्षेत्र में गेहूं लेट बोई गई थी। और यहां फसल अभी छोटी है इसलिए पाला से नुकसान नहीं हो पाया है ।
 वहीं एक फोटो देखें जिसमें तुअर की खड़ी फसल जिसमें अभी दाने पड़े ही थे वह पूरी तरह सूख गई । जिस फसल से किसान को हजारों रुपए मिलते वहां उसे फसल साफ करवाने में ही सौकड़ों रुपए खर्च करने पड़ेंगे ये तुअर की फसल कलारबांकी गांव की है।

Saturday, January 15, 2011

शिवकुमार जी ये क्या कह रहे हैं आप

  दीपक राय सब-एडिटर
एवं किसान भोपाल

भारतीय किसान संघ के प्रदेश अध्यक्ष शिवकुमार शर्मा अब  फिल्म को किसानों की आत्महत्या का कारण बता रहे हैं। उनका दावा है कि किसानों की बदहाली के लिए सरकार नहीं, बल्कि आमिर खान की फिल्म पीपली लाइव ज्यादा बड़ा कारण है। राजधानी में शुक्रवार को पत्रकारों से चर्चा करते हुए श्री शर्मा ने कहा कि बीते दो माह में दस किसान कर्ज के कारण मौत को गले लगा चुके हैं। ‘
शर्मा जी आप जैसे पढ़े-लिखे (एलएलबी व अन्य मास्टर डिग्री हासिल, सरकारी नौकरी छोड़कर किसानी अपनाई , किसानों के हम की लड़ाई के लिए भोपाल में महाबंद कराया) किसान हितौषी  किसान नेता ऐसा कैसे कह सकते हैं। अधिकतर फिल्में तो किसानों के हितों पर ध्यान रखते हुए बनाई गई हैं। और इन्हीं में से एक है ‘पीपली लाईव’ इस फिल्म के लिए तो आपको आमिर खान की तारीफ करनी चाहिए। उन्होंने किसानों को मोहरा बनाने वाले नेताओं और कुछ मीडिया का सच बताया है। ऐसे नेता मप्र में भी तो हो सकते हैं जो वोट बैंक के लिए किसानों को मोहरा बना रहे हों, हो सकता है कोई ‘तत्व’ हों जो किसानों के मन में आत्महत्या की बातें भर रहे हों। क्योंकि किसान तो अन्नदाता है। अगर वो खाद डालता है तो उतनी जितनी कि इंसान पचा सकता है। कभी आपने ‘गेहूं खाने से मौत’ या ‘दाल ने ली जान’ खबर नहीं पढ़ी होगी। अब तो शिक्षक भी किसान की दाल से फायदा उठाता है वह दाल कम पानी ज्यादा मिलाकर बच्चे को मध्यान भोजन खिलवाता है। इंजीनियर तो बेईमानी के चक्कर में पुल इतना कमजोर कर देता है कि वह पहली बारिश में ही बह जाए।  डाक्टर पैसे के चक्कर में प्रसूता को अस्पताल के बाहर ही छोड़ देता है और उसकी मौत हो जाती है। पुलिस रिश्वत के चक्कर में गरीब को जेल तक भिजवा देती है। बस किसान ही है जो ज्यादा लोभ नहीं करता। इसके बाद भी वह फसल खराब होने पर आत्महत्या नहीं करता। नुकसानी की भरपाई करने किसान रवि के मौसम में ‘चना की भाजी और मक्के की रोटी’ खाकर 3 महीने तक व्यतीत कर देता है। गर्मी में ‘बेर को पकाकर’ भोजन करता है। इसके बाद भी अगर अब आत्महत्या बढ़ीं है तो वह किसानों की कमजोरी को दर्शाती है। या फिर उनका नुकसान बहुत ज्यादा हो गया है। उन्हें नए तरीके से खेती के बारे में जागृत नहीं किया गया है।
ढूढिए वजह तो अच्छा होगा
किसानों की समस्याओं से लड़ने वाले लोगों से गुजारिश है कि वे किसानों के बीच जाकर गहरी रिसर्च करें, ऐसे किसान के पास जाएं, जो खरपतवार नाशी दवा डालता तो है पर, तब डालता है जब खरपतवार बहुत बड़े हो जाते हैं। नियम न जानकर वह नकली दवाएं खरीद लेता है। ऐसे किसानों को जागरुक करके ही समस्याएं कुछ हद तक दूर की जा सकती हैं, न कि फिल्मों को दोष देने से।

Thursday, January 13, 2011

‘बेटा खेती नई नौकरी कर’

   दीपक राय, सब एडिटर भोपाल।
बेटा खेती नई नौकरी कर हां यही बात सभी लोग बोलते हैं जब
मैं खेती करने की बात कहता हूं। भले ही क्लर्क की नौकरी क्यों न हो पर खेती न करना। फिर भी मैं खेती करने के इरादे पर अटल रहता हूं। एक बात तो तय है आप क्यों न जज बन जाएं, क्यों न सरकारी वकील या एसपी, कलेक्टर बन जाएं (अगर बेईमान न हुए तो) किसान के बराबर पैसा कभी भी नहीं कमा सकते। पर अब  वही किसान मौत को गले लगा रहा है। एक चपरासी के घर करोड़ों रुपए निकल रहे हैं। क्या हो रहा है यह? ऐसे में युवा खेती से मुंह न मोड़े तो आखिर क्या करे। मेरे गांव के अधिकतर बच्चे खेती न करने की चाह रखते हैं वे 150 दिन में स्कूल में अतिथि शिक्षक बनकर नौकरी करना पसंद कर रहे हैं। ऐसे में मुझे चिंता सताती है कि अगर हर कोई ऐसा सोचेगा तो फसल कौन उगाएगा। हम खाएंगे क्या?

दिसंबर के आखिर और जनवरी के पहले सप्ताह पड़ी कड़ाके की ठंड ने विगत 50 सालों के रिकार्ड तोड़ दिए। प्रदेश में बर्फ जम गया। मैं तब हतप्रद रह गया जब मेरे चाचा की बेटी ने सुबह-सुबह पौधे की पत्तियों से बर्फनुमा ओस उठाकर मुझे दिखाया। कड़ाके की ठँडक में जहां लोग रजाई में दबकर गहरी नींद ले रहे थे। तब एक किसान जिसने कर्ज लेकर बुआई किया है। एक वह किसान जिसकी तुअर (जिसकी दाल हम खाते हैं) की फसल लगी है, वह रजाई में दबकर भी नींद नहीं लगा पा रहा था। आखिर पाला पड़ा(जब तापमान 3 डिग्री से नीचे पहुंच जाता है तो ठंडक पौधों की पत्तियों में जमने लगती है। यह खुले इलाके यानी खेतों में ज्यादा होती है। और पूरी तरह  पौधा मरने लगता है।) पड़ा और किसान की फसल तबाह हो गई। अब कर्ज कैसे चुकाए, आने वाले महीने में क्या खाएं क्योंकि फसल तो कुछ भी नहीं बची। मुआवजा तो ऊंट के मुंह में जीरा के समान मिलेगा, पता नहीं वह भी कब मिलेगा। हां यह सच है प्रकृति हमेशा प्रहार नहीं करती वह भी किसानों की हितैषी भी है। पर इस बार तो नुकसान हो ही गया।
अब ऐसे में किसान बनने की चाहत कौन रखेगा। प्रकृति की मार झेल रहे किसान की पीड़ा पर मरहम लगाने की बजाए प्रदेश के कृषि मंत्री का घटिया बयान कि ‘यह तो किसानों के कर्मों का ही फल है’ अगर किसान को कर्मों का फल ऐसे ही मिलता है तो सोचिए भ्रष्ट मंत्रियों को उपर वाला क्या फल देगा। उन्हें इसकी चिंता आज से ही करनी चाहिए।
एक के बाद एक किसान आत्महत्या कर रहे हैं। ऐसे में खेती कहां तक लाभ का सौदा होगी। ऐसे में कई बार मैं भी सोचता हूं कि किसान सहीं कहता है ‘बेटा खेती नई नौकरी करियो’




समाचार इस प्रकार है
(13 जनवरी को पीपुल्स समाचार में  प्रकाशित )
दमोह जिले के ग्राम महलवारा के किसान मोहन रैकवार द्वारा जहरीला पदार्थ पीकर आत्महत्या के प्रयास के चौबीस घंटे भी नहीं बीते थे कि बोरीखुर्द के किसान कन्हैयालाल पटेल (30) ने कीटनाशक पीकर आत्महत्या का प्रयास किया। दूसरी ओर नरसिंहपुर में तेंदूखेड़ा के कठौतिया निवासी चोखेलाल मेहरा (37) ने रेल से कटकर जान दे दी। बताया जाता है कि आर्थिक तंगी के चलते उसने यह कदम उठाया। रेलवे पुलिस ने उसके पास से सुसाइड नोट बरामद होने को नकारा है। नरसिंहपुर के ही करेली क्षेत्र में एक और किसान धनराज कौरव (55) पिता हरिराम कौरव ने सल्फास खाकर जान देने की कोशिश की, जिसे जिला चिकित्सालय में भर्ती कराया गया है।
जानकारी के अनुसार इन तीनों ही मामलों में आर्थिक तंगी और पाले की वजह से फसल बर्बाद होने की वजह से अन्नदाताओं ने आत्मघाती कदम उठाया। हालांकि प्रशासन का दावा है कि जांच की जा रही है और आत्महत्या के प्रयासों के कारणों का पता जल्द ही लगा लिया जाएगा। दमोह में पाले से फसलों को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है, जहां आत्महत्या के मामले लगातार सामने आ रहे हैं।
दमोह जिले के हटा थाना अंतर्गत ग्राम बोरीखुर्द के छपरा निवासी कन्हैयालाल पटेल (30) ने बुधवार को सुबह पांच बजे खेत में रखे कीटनाशक का सेवन कर आत्महत्या का प्रयास किया। उसे इलाज के लिए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र हटा में भर्ती कराया गया जहां से उसे दमोह जिला चिकित्सालय रैफर कर दिया गया।
कन्हैयालाल के भाई संतोष पटेल ने बताया कि उसके भाई कन्हैया ने सात एकड़ जमीन शिवदयाल अहिरवार से 32,500 रुपए में तथा हटा निवासी शंकर स्वामी की 4 एकड़ जमीन सात बोरा चना में अधिया पर लिया था।  उसके भाई ने इस जमीन पर अरहर और मसूर की बोवनी की थी, लेकिन पाला पड़ने से उसकी संपूर्ण फसल तबाह हो गई।  कन्हैयालाल ने गांव के ही गुड्डू अहिरवार से 10 हजार व परम मिस्त्री से 20 हजार रुपए का कर्ज लिया था। 
तेरहवीं के लिए बेचे बैल
छिंदवाड़ा। छिंदवाड़ा जिले के पांढुर्णा में किसान की तेरही के लिए उसके परिजनों द्वारा धन जुटाने के लिए कथित तौर पर एक जोड़ी बैल बेचे जाने का मामला प्रकाश में आया है। पांढुर्णा तहसील मुख्यालय के गांधी वार्ड निवासी किसान मोतीराम खोड़े ने छह जनवरी को जहर खाया था, नागपुर में उसकी मौत हुई थी। मोतीराम के पुत्र ललित का कहना है कि उसके पिता पर 1.70 लाख रुपए का कर्ज था। ललित ने बताया कि आर्थिक तंगी के बीच 20 जनवरी को होने वाली तेरही भोज के लिए उन्होंने बैल जोड़ी बेचकर रकम जुटाई।
दमोह। मध्य प्रदेश के कृषि मंत्री रामकृष्ण कुसमरिया पाला पड़ने से हुई फसलों की बर्बादी को पुराने पापों का फल   मानते हैं। उनका कहना है कि खेती में रसायनों का इस्तेमाल बढ़ने से मिट्टी की सेहत खराब हुई है और उसकी प्रतिरोधक क्षमता खत्म हो चुकी है। ऐसा होने से मिट्टी में नमी नहीं रहती और पाला अपना असर दिखा जाता है।  कुसमरिया ने कहा कि एक ओर जंगल कट गए हैं तो दूसरी ओर गाय का उपयोग कम हो रहा है। संतुलन गड़बड़ाने से यह हो रहा है।
किसानों की बर्बादी उनके पापों का फल
कुसमरिया ने प्राकृतिक संतुलन गड़बड़ाने से मानव जाति के विलुप्त होने की भी आशंका जताई है। उनका कहना है कि जब डायनासोर विलुप्त हो सकते हैं, तो मानव क्या चीज है। उन्होंने आगे कहा है कि अब सचेत होने का वक्त आ गया है, अब प्रकृति से खिलवाड़ बंद कर उसे प्रसन्न करना होगा। इसके लिए वृक्षारोपण करना होगा, गोपालन को बढ़ावा देना होगा और जैविक खेती को अपनाना होगा। उन्होंने आशंका जताई कि अगर ऐसा नहीं हुआ तो और भी घातक नतीजे सामने आएंगे।

Tuesday, December 21, 2010

     दीपक राय  
    सब एडिटर भोपाल
    किसान और हममें क्या अंतर है... 1. हमें शहर में 20-24 घंटे बिजली मिलती है पर किसान को सिर्फ 5-6 घंटे ही बिजली दी जा रही है। 2. जहां शहर में काम करने वाला एक बाबू तक करोड़पति है पर किसान मर जाता है पर एक साथ पचास हजार रुपए तक नहीं देख पाता। 3. छोटे-छोटे कामों के लिए बार-बार शहर आता है, रिश्वत देता है तब उसे खसरा नक्शा व अन्य प्रमाणपत्र मिलते हैं। 4. रात में जब हम रजाई ओढ़के सोते हैं तब वह रात की शिफ्ट (12-6) बजे तक खेतों की सिंचाई करता है। 5. किसान की फसल खराब होती है तो उसे पर्याप्त मुआवजा नहीं दिया जाता, मुआवजा देते समय हम जैसे कई पढ़े-लिखे अधिकारी रिश्वत लेते हैं। 6. हमारे बच्चे (शहर में) केजी से ही ए-जेड तक अंग्रेजी पढ़ते हैं, पर किसान का बेटा बमुश्किल 6वी कक्षा में अंग्रेजी का नाम सुनता है। 7. जब हमारी तन्ख्वाह नहीं बढ़ती तो हम स्कूल बंद कराते हैं, अस्पताल में मरीजों को नहीं देखते, तोड़फोड़ करते हैं। 8. हां पर जब फसल तैयार होती है तो हम उसके द्वारा पैदा किए गए अनाज को खाते हैं।  लेकिन यह महाआंदोलन किसानों ने ही किया आखिर कब तक दबे-कुचले जिएंगे हमारे अन्यदाता। एक दिन के जाम ने भोपाल की रफ्तार बंद कर दी। किसानों ने लोगों से माफी भी मांगी कि उनके कारण शहरवासियों को दिक्कतें हुर्इं। उनका मिजाज देखिए  180 में से सिर्फ 50 मांगें मानी गर्ईं और उन्होंने आंदोलन खत्म कर दिया। ऐसे हैं हमारे किसान। किसान आंदोलन की रत्ती-रत्ती भर जानकारी के लिए नीचे पढ़िए

  • प्रदेश भर से किसान पंद्रह दिन के आंदोलन की हिसाब से अपनी व्यवस्था करकर आए हैं। वे ट्रॉली में खाद्यान्न के साथ ही पीने और निस्तार के लिए पानी तथा ओढ़ने-बिछाने के लिए कपडे लाए हैं। महीनेभर पहले संघ के पदाधिकारियों ने  प्रदेशभर  के  ग्रामीण  क्षेत्रों  में  पर्चे  बंटवा दिए थे, जिसमें पंद्रह दिन के राशन, पानी समेत गर्म कपड़े साथ लाने की बात कही गई थी। किसानों को भोपाल
    लाने के लिए पदाधिकारियों ने ट्रेनों व वाहनों की व्यवस्था भी की थी। ठहरने की व्यवस्था रवीन्द्र भवन परिसर में बने पार्क में की गई है।
    रात को जमकर नाचे
    मुख्यमंत्री निवास के पास स्थित प्रियदर्शिनी पार्क में सोमवार को  किसानों ने सरकारी की वादाखिलाफी के खिलाफ भड़ास निकाली। वहीं रात में जमकर नाच गाना किया। सोमवार सुबह से यह पार्क बाहर से आए किसानों से खचाखच भर गया। दिन भर यहां सभा होती रही। नेताआें ने कई बार मुख्यमंत्री और मीडिया पर गुस्सा उतारा। शाम साढेÞ पांच बजे सभा खत्म हो गई। इसके बाद  रात तक किसान नाचते गाते रहे।
    दुकानदारों की चांदी
    सभा स्थल के बाहर देर रात तक खोमचे वालों का जमावाड़ा लगा रहा। इसके अलावा पानी के पाउच, मूंगफली और नाश्ते के ठेले लगे हुए थे।
    आत्महत्या की कोशिश
    रोशनपुरा चौराहे पर एक किसान ने आत्महत्या की कोशिश की, लेकिन  पुलिस ने पहुंच कर उसे रोक दिया। उसका कहना था कि वह बहुत परेशान है।
    सड़कों पर बनीं बाटियां
    प्रदर्शन के लिए आए किसानों ने सड़कों पर ही खाना बनाया।  किसानों ने कंडे जला कर बांटियां सेंकी और बैगन तथा आलू भून कर खाए। 
    बच्चे-बुजुर्ग भी आए
    प्रदर्शन में  बच्चे और बुजुर्ग किसान भी शामिल हुए। बच्चों ने सुबह से ही चक्काजाम के लिए मोर्चा संभाल लिया, वहीं बुजुर्ग किसान ट्रालियों में आराम फरमाते रहे।
    दस रुपए में खाना
    भारतीय किसान संघ ने किसानों के लिए सभा स्थल पर भोजन की सशुल्क व्यवस्था की थी। जो खाने का सामान नहीं लाए थे, वे दस रुपए का कूपन लेकर भोजन के पैकेट ले सकते थे।
    शराब की दुकानें बंद
    चेतक ब्रिज, 11 मील और रोशनपुरा पर किसानों का उग्र रवैया देखते हुए जिला प्रशासन ने एहतियातन इन इलाकों की शराब की दुकानें बंद करा दीं। दरअलस किसान बड़ी संख्या में शराब की दुकानों पर एकत्रित हो रहे थे, जहां दुकानदारों से हुज्जत भी हुई। रात में 10.30 बजे के बाद कुछ दुकाने खुल गर्इं।

  •   राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े भारतीय किसान संघ ने पांच हजार टैक्टर-ट्रालियों से बंद किए भोपाल के प्रमुख रास्ते
  •     प्रदेश के कई जिलों से आए 1 लाख से ज्यादा किसानों ने प्रमुख चौराहों और हाईवे को किया हाईजैक
  •    एक लाख किसानों को भोपाल की सीमा पर रोका गया
  •    बिजली, सिंचाई के लिए पानी, फसलों की लागत के अनुरूप बोनस की किसान कर रहे मांग
  •     राजभवन और मुख्यमंत्री निवास जाने वाली सड़कों पर भी नहीं चल सके वाहन
  •    मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और मंत्रियों सहित नेताओं और अफसरों तक ने उठाई परेशानी
  •    प्रमुख सड़कों पर रेंगती दिखीं गाड़ियां, नहीं हुए किसानों को शांत करने के गंभीर प्रयास
  •    चेतक ब्रिज चौराहे पर आरएएफ को हटाना पड़ा मरने-मारने को उतारू लठैत किसानों के सामने से
  •    ट्रैक्टर-ट्रालियों में बिस्तर और 15 दिन के खाने-पीने के सामान से लैस हैं किसान
  •    रोशनपुरा चौराहे पर एक किसान ने की आत्महत्या की कोशिश
  •     लचर पुलिस और प्रशासनिक इंतजामों की खुल गई पोल 
  • सात साल में पहली मर्तबा फूटा गुस्सा
    •    30 अगस्त 2006: मुख्यमंत्री निवास में किसान पंचायत में कई वादे किए गए।
    •  13 अप्रैल 2007 : किसान मंच की बैठक मंत्रालय में हुई।
    •   20  फरवरी 2008 :  जंबूरी मैदान में किसान महापंचायत बुलाई। जिसमें मुख्यमंत्री ने कई घोषणाएं कीं।
    •  25 जून 2008: किसान मंच की तीसरी बैठक मंत्रालय में हुई। किसान प्रतिनिधियों से कई सुझाव आए।
    •  4 फरवरी 2009 : भारतीय किसान संघ  द्वारा लाल परेड ग्राउंड पर रैली आयोजित की गई।
    •  9 दिसंबर 2010 : भारतीय किसान संघ  ने मुख्यमंत्री, कृषि मंत्री और आला अधिकारियों को 183 मांगों का ज्ञापन सौंपा। साथ ही इसका निराकरण नहीं होने पर 20 दिसंबर को राजधानी में सांकेतिक धरने की सूचना दी गई।  
    •   पंद्रह दिन के राशन के साथ डाला डेरा   
    • प्रमुख मांगे
  •  गांवों में 24 घंटे बिजली की आपूर्ति।
  • महापंचायत की घोषणाओं पर अमल हो।
  •   बिजली चोरी  प्रकरण निरस्त हों।
  •   उपजाऊ जमीन अधिग्रहीत न हो।
  •   नया भू अर्जन कानून बनाया जाए।
  •   अर्जित भूमि पर स्थापित उद्योग में परिवार के एक सदस्य को नौकरी।
  •   सांईखेड़ा-तूमड़ा जिला नरसिंहपुर में एनटीपीसी प्रोजेक्ट निरस्त करें।
  • इंडस्ट्रियल कॉरीडोर के लिए किसान नहीं देंगे अपनी जमीन।
  •   आरबीसी एक्ट में संशोधन
  •   कृषि भूमि की रजिस्ट्री के लिए स्टांप डयूटी समाप्त की जाए।
  •   भू अधिकार एवं ऋण पुस्तिका को ही अधिकृत किया जाए।
  • किसी भी स्तर पर फसल बीमा की अनिवार्यता समाप्त कर इसे ऐच्छिक किया जाए।
  •   तिकली और तिपहिया तौल कांटों को समाप्त कर इलेक्ट्रानिक एवं प्लेट तौल कांटे को अनिवार्य करें।
  • नगर पंचायत, नगर पालिका और नगर निगम की सब्जी बाजारों को मंडी बोर्ड के तहत लाया जाएं।

  प्रदेशभर से आए एक लाख से ज्यादा किसानों ने 5 हजार ट्रैक्टर ट्रालियों की मदद से सोमवार को राजधानी के प्रमुख चौराहों और हाइवे को हाइजैक कर लिया। इससे राजधानी की यातायात व्यवस्था ध्वस्त हो गई। किसानों ने राज्यपाल और मुख्यमंत्री निवास जाने वाले  पालीटेक्निक चौराहे पर ट्रैक्टर-ट्रालियां लगाकर ऐसा जाम लगाया कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहा

क्या क्या कहाँ कहाँ हुआ

रोशनपुरा चौराहे पर कांग्रेस भवन से लेकर मुल्ला रमूजी चौराहे तक दोनों ओर की सड़कों पर किसानों ने आड़ी-तिरछी ट्रैक्टर-ट्रॉलियां खड़ी कर दीं। न्यू मार्केट से पॉलीटेक्निक होकर पुराने शहर को जाने वाला रास्ता पूरी तरह बंद था। ऐसे में वाहन चालकों को रोशनपुरा से जहांगीराबाद, काली मंदिर, सेंट्रल लाइब्रेरी, बस स्टैंड होकर पुराने शहर की तरफ जाना पड़ा।
पॉलीटेक्निक चौराहा : किसानों ने बाणगंगा पुल से पॉलीटेक्निक चौराहे तक ट्रॉलियों की कतार लगा दी थी। डंडे लेकर खडेÞ प्रदर्शनकारी वाहन चालकों को रोकने के साथ बदसलूकी कर रहे थे। वीआईपी रोड से होकर हमीदिया अस्पताल, ईएमई सेंटर व लालघाटी चौराहा जाने वाले वाहन चालक डिपो चौराहे से मुख्यमंत्री निवास, भारत भवन से आ-जा रहे थे। इससे यहां जाम लगा।
चेतक ब्रिज :चेतक ब्रिज पर किसानों के कब्जा कर लेने के कारण ट्रैफिक पुलिस ने बोर्ड आॅफिस चौराहे पर चारों दिशाओं के वाहनों का प्रवेश बंद कर दिया। ऐसे में न्यू मार्केट से आने वाले वाहनों  से रचना नगर अंडरब्रिज, गौतम नगर, चेतक ब्रिज के नीचे घंटों जाम लगा रहा।
11 मील तिराहा: होशंगाबाद रोड स्थित 11 मील तिराहे पर किसानों ने सुबह 8 बजे से चक्काजाम कर दिया।न और मंत्रियों सहित नेताओं अ  सीएम, मंत्री  परेशानौर अफसरों तक को परेशानी का सामना करना पड
Þा।मुख्यमंत्री को सुबह पीटीआरआई में पुलिस अधिकारियों की एक बैठक में जाना था। पॉलिटेक्निक चौराहे पर लगे जाम की वजह से उन्हें काफी घूम कर पीटीआरआई पहुंचना पड़ा, जिससे वे करीब पंद्रह मिनट लेट हो गए। वित्त मंत्री राघवजी सुबह रायसेन जाने के लिए निकले थे और पुल बोगदा पर डेढ़ घंटे तक जाम में फंसे रहे। जाम का असर ही था कि गृह मंंत्री उमाशंकर गुप्ता सहित कई मंत्री भोपाल में होने के बावजूद आज मंत्रालय नहीं पहुंचे। ऊर्जा मंत्री राजेंद्र शुक्ल एक मीटिंग के लिए सिलसिले में मंत्रालय आए और दोपहर का खाना उन्हें यहीं खाना पड़ा।
स्मृति ने पार किया रेलवे ब्रिज: महिला मोर्चा की राष्ट्रीय अध्यक्ष स्मृति ईरानी को  जाम के कारण भाजपा कार्यालय  काफी घूम कर जाना पड़ा। दूध डेरी की ओर से हबीबगंज स्टेशन तक उन्हें लाया गया। रेलवे फुट ब्रिज पार कर वे स्टेशन के मुख्य गेट पर आईं और वहां से कार से भाजपा प्रदेश कार्यालय पहुुंची। ईरानी को इसी तरीके से घंटे भर बाद फिर विमानतल ले जाया गया। 
प्रभात झा ने छोड़ी गाड़ी: 


   फोटो परिचय- किसानों ने ट्रैक्टर से जाम लगा दिया, वे जहां आंदोलन कर रहे थे वहीं खाना बनाने लगे। रात में वहीं सो गए।  
  यह फोटो हमें उपलब्ध कराए हैं फोटो जर्नलिस्ट नवीन बेलवंशी ने




भोपाल कूच कर रहे किसानों के ट्रेक्टरों द्वारा लगाए गए जाम के कारण भाजपा प्रदेशाध्यक्ष को रविवार रात होशंगाबाद में गाड़ी छोड़ कर ट्रेन पकड़नी पड़ी। झा बैतूल से सड़क मार्ग से भोपाल के लिए निकले थे और देर रात तक होशंगाबाद में लगे जाम में फंसे रहे।
   मध्यप्रदेश का टिकैत
प्रभु पटैरिया   वरिष्ठ पत्रकार पीपुल्स समाचार

सोमवार सुबह सड़क पर निकले लोग भले ही मुख्य चौराहों पर भारी तादाद में किसानों को देख दांतो तले अंगुलियां दबा रहे हों, लेकिन गुरिल्ला युद्ध की तरह किसानों का शहर पर यह कब्जा रविवार रात को ही होना शुरू हो गया था। छत्रपति शिवाजी की भांति किसानों ने शहर के किसी कोने के बजाए ठीक प्रदेश के ‘राजा’ के घर के सामने डेरा जमाया। मप्र में पहली बार इतनी शांति से एक लाख से अधिक किसानों के इतने बड़े आंदोलन ने 1980 और 1990 के दशक के किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत की याद दिला दी। चौधरी चरण सिंह के बाद वे पकी उम्र में पश्चिमी उप्र के किसानों के मसीहा बन कर उभरे थे और दिल्ली में ऐसे ही ट्रैक्टर अड़ा कर किसानों की मांगे मनवाते थे।
जी हां, टिकैत की तरह। शायद उनसे भी एक कदम आगे बढ़ कर आरएसएस के सहयोगी संगठन भारतीय किसान संघ के 67 वर्षीय प्रदेशाध्यक्ष शिवकुमार शर्मा ने धीरे से देश के मध्य भाग में अब तक के सबसे बडेÞ किसान आंदोलन का इतिहास रच दिया। सरकारी नौकरी छोड़ कर किसान संघ से जुड़े शर्मा सात साल से किसानों की समस्याओं पर प्रदेश की भाजपा सरकार और उसके नेताओं से बातचीत कर रहे थे। समाधान की उनकी हर कोशिश में ज्ञापन के पन्ने बढ़ते चले गए और आज उसमें 183 बिंदु हो गए हैं। जबलपुर विवि के छात्र नेता रहे शर्मा को इस आंदोलन के लिए कानून का भी डर नहीं लगा, क्योंकि वे खुद एलएलबी हैं। सरकार को न पसीजता देख शर्मा और उनकी टीम ने छह माह से गांव-गांव जाकर किसानों को ऐसा जगाया कि खड़ी फसल की चिंता छोड़, बिना शोर शराबा किए टैÑक्टरों में सवार हो किसानों का हुजूम भोपाल आ पहुंचा। हाड़ कंपकपाती ठंड, सर्द हवाओं व खुले आसमान से बेखबर किसान सड़कों पर दाल-बाटी सेंक सरकार के निर्णय की प्रतीक्षा कर रहे हैं। सिर पर आए किसान और शहर में घुस आए पांच हजार से अधिक ट्रैक्टरों को देख सरकार जागी भी पर किसानों द्वारा केवल 50 मांग ही रखने और सरकार द्वारा उन्हें जायज करार देने के बाद भी ‘मशीनरी’ इनसे संबंधित आदेश निकालने को तैयार नहीं हुई। इसलिए किसानों को राजधानी की सड़कों पर दो-चार दिन बिताने पड़ें तो बिताने दीजिए। सड़कें जाम होने के लिए उन्हें कोसिए पर ध्यान रखिए वे अन्नदाता हैं। पेट पालने के साथ सरकारें बनवाने वाले प्रदेश के अन्नदाता आज पहली बार जागे हैं, तो उनकी समस्याओं का समाधान जरूरी है।

  जिम्मेदार कौन?
पुलिस या खुफिया तंत्र

ब्रजेश चौकसे, वरिष्ठ पत्रकार पीपुल्स संवाददाता।
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जिस समय राजधानी में प्रदेश भर के पुलिस अधीक्षकों को एसी चैम्बरों से निकलकर मैदानी स्तर पर पुलिस की विजिबिलिटी बढ़ाने की नसीहत दे रहे थे, उस वक्त भोपाल पर किसानों ने कब्जा कर पूरी व्यवस्था चौपट कर रखी थी। व्यवस्था बनाने के लिए अफसर दिखाई दे रहे थे, न पुलिसकर्मी। किसानों में आक्रोश अचानक नहीं फूटा और न ही अचानक उठकर वे भोपाल पहुंचे। बल्कि पूरी योजना और तैयारी के साथ प्रदेश भर से हजारों किसान ट्रैक्टर-ट्रॉलियों से राजधानी पहुंचे। न तो खुफियां तंत्र को भनक लगी और न 24 घंटे चौकन्ना रहने का दम भरने वाली पुलिस को। कौन है, इसका जिम्मेदार? एडीजी इंटेलीजेंस ऋषि कुमार शुक्ला या आईजी डॉ. शैलेंद्र श्रीवास्तव या फिर एसएसपी आदर्श कटियार। इनसे भोपाल के रहवासी पूछ रहे हैं कहां थी, आपकी पुलिस। भोपाल में दो-दो एसपी, आधा दर्जन एएसपी और दर्जन भर से अधिक डीएसपी  हैं, वे रात को शहर में क्यों नहीं निकलते, जबकि पहले दो एएसपी होने के बावजूद रात भर अधीनस्थों को चैक करते थे। आरामतलब हो चुकी पुलिस की गश्त की पोल भी किसानों ने खोल दी। शहर की सीमाओं पर रात भर प्वाइंट लगाकर चैकिंग करने वाली पुलिस कहां थी? किन ट्रकों से ‘वसूली’ में व्यस्त थी। गश्त चैक करने वाले अधिकारी कहां थे, कहां बैठकर कागजी खानापूर्ति कर रहे थे, उनसे जवाब लिया जाना चाहिए। जबकि रविवार रात 11 बजे से किसानों का सीएम निवास के सामने पॉलीटेक्निक चौराहे पर जमावड़ा शुरू हो गया था। विभिन्न रास्तों से शहर में प्रवेश करने वाले ट्रैक्टर-ट्रॉली सवार किसानों को किसी ने रोककर क्यों नहीं पूछा, उन्हें बॉर्डर के थानों पर क्यों नहीं रोका गया। मजे की बात यह है कि इस रात पुलिस पूरे शहर में कांबिंग गश्त कर रही थी। कांबिंग गश्त उसे कहते हैं, जिसमें पुलिस हर इलाके के चप्पे-चप्पे की तलाशी करती है। कैसा होता है भोपाल पुलिस का तलाशी अभियान,  इसकी कलई भी किसानों ने खोल दी है। मान भी लें कि पुलिस को अंदेशा नहीं था कि इतनी बड़ी संख्या में किसान भोपाल आ जाएंगे तो उनके आने के बाद भी ट्रैफिक परिवर्तन की योजना क्यों नहीं बनाई गई, क्यों लोगों को उनके हाल पर छोड़ दिया गया। किसानों के इस आंदोलन ने खुफिया तंत्र और भोपाल में बैठे आला अफसरों की काबिलियत पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। 


Thursday, December 2, 2010

इन्हें सलाम

  3 दिसंबर को विश्व विकलांगता दिवस है ऐसे में भोपाल के यह चेहरे विकलांगता को चिढ़ाकर अच्छों -अच्छों को पछाड़ रहे हैं ऐसे में इन्हें सलाम

Wednesday, November 24, 2010

ये पब्लिक है, सजा देती है, मजा देती है

nitish  apne parivaar ke saath chunav jeetne ke baad

क्या आप नेता हैं, क्या आप वोट डालते हैं, क्या आप जागरुक हैं?
खैर कोई बात नहीं आप जो भी हैं। पर एक बात जरूरी है कि जनता जागरुक हो गई है। यह बात बिहार चुनाव में नीतीश की जीत ने साबित कर दिया है। यह वही राज्य है जहां पर लालू ने खूब रबड़ी खाई है, यह वही राज्य है जहां के लोगों से अधिकतर भारतीय राज्यों के लोग ‘डर’ महसूस करते  हैं। बिहार को अपराधों का राज्य भी कहा जाता रहा है। करीब एक साल पहले जब भोपाल के लालघाटी के पास सामूहिक बलात्कार की घटना सामने आई तो दूसरे दिन देश के एक बड़े अखबार के माने जाने पद पर बैठे इंसान ने लिखा था ‘भोपाल को बिहार होने से बचाएं’। यानी बिहार में ऐसी सत्ता थी जो अपराध को कम नहीं कर पाती थी। लेकिन जब से नीतीश ने राज्य की डोर हाथ में ली तो वहां अपराध में कमी आई। विकास हुआ। सबसे बड़ी बात  यहां की जनता में राज्य सरकार के प्रति विश्वास जागा है, यह विश्वास करीब कई सालों पहले गायब हो गया था। एक बात और है। यहां की जनता जागरुक हो गई है। लालू जो कि अब घर में बैठकर भजन करने की क्षमता रखते हैं ने जनता को खूब बेवकूफ बनाया, लेकिन ये पब्लिक है मेरे दोस्त सब जानती है। कहते हैं गलत कर्माें की सजा उपरवाला देता है, यह पूरी तरह गलत है। सजा या फल तो आपको धरती में ही मिल जाता है तभी तो राबड़ी देबी दो सीटों से लड़ने के बाद बुरी तरह हार गर्इं। कुछ भी हो मैं बिहारी जनता को सलाम करता हूं वाकई हम भी उससे सीखें  । न तो वह किसी पार्टी के बहकावे में आई और न ही चोचलेबाजी में उसने नीतीश को एक मौका और दे दिया। कुछ दिन पहले नीतीश पर कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी ने आरोप लगाए कि नीतीश ने केंद्र के पैसों का सदुपयोग नहीं किया और बिहार का विकास अवरुद्ध हुआ है। तब नीतीश ने बयान दिया कि मुझे एक मौका और दिया जाए तब मैं यहां सुधार की गाड़ी आगे चलाउं यानि नीतीश ने स्वीकारा कि विकास कम ही हुआ है। बस क्या है जनता ने दे दिया एक और मौका। नीतीश सरकार यानी (जदयू-भाजपा गठबंधन) को 243 में से  204 सीटों पर विजय मिली है।  आईबीएन 7 ने अपने एक लेख में  लिखा कि देश के किसी भी राज्य में पहली बार इतनी अधिक सीटों से एनडीए जीती है।  पर नीतीश को जनता के विश्वासों का ध्यान रखना होगा और राज्य में रोजगार (क्योंकि राज्य से पलायन अभी जारी है) और शिक्षा के अवसर बढ़ाने होंगे वह भी ईमानदारी से वरना ये तो पब्लिक है......