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| Dr. Deepak Rai Article about CM Mohan Yadav |
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| IAS Bharat Yadav Birth Day |
जन्मदिन विशेष : प्रशासनिक सेवा में अभूतपूर्व कार्यों और लोक-कल्याणकारी नवाचारों से समृद्ध एक ऐतिहासिक सफर
प्रशंगवश
डॉ.दीपक राय
मध्य प्रदेश कैडर के 2008 बैच के भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के वरिष्ठ अधिकारी भरत यादव किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं। 20 जून 1981 को दतिया जिले में जन्मे भरत यादव का जीवन उन युवाओं के लिए एक बड़ी प्रेरणा है, जो अपनी मेहनत, लगन और कड़े परिश्रम के दम पर समाज में अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाना चाहते हैं। आज उनके जन्मदिन के विशेष अवसर पर, उनके द्वारा प्रशासनिक सेवा में किए गए अभूतपूर्व कार्यों, संवेदनशीलता और जनहित के नवाचारों को याद करना बेहद लाजिमी हो जाता है। 'पूत के पांव पालने में ही दिख जाते हैं' की कहावत को पूरी तरह चरितार्थ करने वाले भरत यादव बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के थे। उन्होंने कक्षा 5वीं में ही नवोदय विद्यालय की कठिन प्रवेश परीक्षा सफलतापूर्वक उत्तीर्ण कर ली थी। इसके बाद उन्होंने अंग्रेजी साहित्य (बीए) और राजनीति शास्त्र (एमए) में उच्च शिक्षा प्राप्त की। पढ़ाई के प्रति उनकी ललक का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि रेलवे में टीटीई की व्यस्त और कठिन नौकरी के दौरान भी उन्होंने अपने अध्ययन को निरंतर जारी रखा और अंततः अपनी कड़ी मेहनत के बल पर देश की सबसे प्रतिष्ठित भारतीय प्रशासनिक सेवा में स्थान हासिल किया।
आईएएस बनने के बाद भरत यादव की पोस्टिंग अलीराजपुर में सहायक कलेक्टर के रूप में हुई। इसके बाद उन्होंने होशंगाबाद में सहायक कलेक्टर, मुलताई में एसडीएम, नरसिंहपुर में जिला पंचायत सीईओ, उपसचिव नगरीय प्रशासन और प्रोजेक्ट डायरेक्टर 'उदय' के रूप में अपनी सेवाएं दीं। भरत यादव की कार्यशैली शासन और जनता दोनों को इतनी पसंद आई कि उन्हें 7 महत्वपूर्ण जिलों—सिवनी, बालाघाट, जबलपुर, मुरैना, ग्वालियर, छिंदवाड़ा और नरसिंहपुर में कलेक्टर के रूप में काम मिला। अपनी इस लंबी प्रशासनिक यात्रा में उन्होंने कभी भी अपने ऊपर 'लालफीताशाही' या प्रशासनिक अहंकार को हावी नहीं होने दिया। उनके कार्यालय का दरवाजा समाज के सबसे अंतिम और आम आदमी के लिए हमेशा खुला रहता और उनसे मिलने के लिए किसी को भी लंबा इंतजार नहीं करना पड़ता। कलेक्टर के रूप में उनकी पहली पदस्थापना सिवनी जिले में हुई, जहां उन्होंने सुशासन के ऐसे कीर्तिमान स्थापित किए जिन्हें आज भी सिवनी के नागरिक याद करते हैं। वर्ष 2015 में जब वे एक दृष्टिहीन बच्चों के स्कूल में पहुंचे, तो वहां आर्थिक तंगी के कारण कई अव्यवस्थाएं थीं। उन्होंने तुरंत सामाजिक भागीदारी को बढ़ावा देते हुए एक चैरिटी शो का आयोजन करवाया और सामूहिक सहयोग से लगभग डेढ़ करोड़ रुपये की राशि जुटाई, जिसने उन दिव्यांग बच्चों का जीवन संवार दिया।
यही नहीं, मीडिया की एक खबर का स्वतः संज्ञान लेते हुए उन्होंने सड़कों पर लावारिस घूम रहे मानसिक रूप से दिव्यांग जनों के लिए एक विशेष 'पुनर्वास योजना' बनाई। उन्हें बेहतर इलाज के लिए ग्वालियर भेजा गया, जिसके सुखद परिणाम स्वरूप दो मानसिक दिव्यांग पूरी तरह स्वस्थ होकर आज अपने परिवारों के साथ सम्मानजनक जीवन जी रहे हैं। उस दौर में जब सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'फेसबुक' नया और लोकप्रिय हो रहा था, तब वे खुद इस पर सक्रिय रहते थे। लोग फेसबुक मैसेंजर पर उन्हें अपनी समस्याएं भेजते थे, जिस पर वे तुरंत संज्ञान लेकर संबंधित अधिकारियों को मौके पर भेजते और समस्या के समाधान की तस्वीर भी साझा करवाते थे।
भरत यादव की दूसरी पदस्थापना बालाघाट कलेक्टर के रूप में रही, जहां उन्होंने 151 दिव्यांग जोड़ों का सामूहिक विवाह संपन्न कराकर एक अनोखा रिकॉर्ड स्थापित किया। वे जिले के उन अत्यंत दुर्गम और सुदूर गांवों का दौरा करने खुद पहुंच जाते थे, जहां आजादी के बाद से अब तक कोई भी प्रशासनिक अधिकारी कदम नहीं रख पाया था। मुरैना जिले के कार्यकाल के दौरान वे नियमित रूप से स्कूल-कॉलेजों में जाकर युवाओं से संवाद करते थे और उन्हें करियर के लिए प्रेरित करते थे। उन्होंने भारतीय सेना (आर्मी) में शामिल होने की तैयारी कर रहे स्थानीय युवाओं के लिए विशेष लाइब्रेरी खुलवाई और शारीरिक प्रशिक्षण के लिए आवश्यक खेल संसाधन भी उपलब्ध कराए। ग्वालियर में भी कलेक्टर के रूप में उनके जनहितैषी कार्यों की एक लंबी फेहरिस्त रही।
वैश्विक महामारी कोविड-19 के दौरान जब संकट गहरा रहा था, तब जबलपुर कलेक्टर के रूप में उन्होंने देश के सबसे लंबे नेशनल हाईवे से जुड़े इस जिले में बेहद सक्रिय लॉकडाउन उपाय और सख्त एसओपी लागू करवाया। इस 'जबलपुर मॉडल' को बाद में राज्य के अन्य जिलों में भी लागू किया गया। उन्होंने कोरोना की पहली लहर के दौरान जनसहयोग के माध्यम से एक लाख से अधिक जरूरतमंद लोगों को सूखा राशन बांटने का अभूतपूर्व रिकॉर्ड बनाया, जिसके चलते जबलपुर जिला राष्ट्रीय स्तर पर 5वें और मध्य प्रदेश में पहले स्थान पर आंका गया। इसी दौर में जब वे नरसिंहपुर के कलेक्टर थे, तो उन्होंने संवेदनशीलता की एक बड़ी मिसाल पेश की। जब आम तौर पर अधिकारी सीधे संपर्क से बच रहे थे, तब भरत यादव खुद को खतरे में डालते हुए पीपीई किट पहनकर सीधे जिला चिकित्सालय के कोविड वार्डों में पहुंच गए। वहां उन्होंने संक्रमित मरीजों का हालचाल जाना और अग्रिम पंक्ति में लड़ रहे मेडिकल स्टाफ का हौसला बढ़ाया।
कलेक्ट्रेट के दायित्वों के बाद भरत यादव ने प्रबंध संचालक (ऊर्जा विकास निगम), आयुक्त (म.प्र. गृह निर्माण मंडल) और आयुक्त (नगरीय प्रशासन विभाग) जैसे महत्वपूर्ण राज्य स्तरीय पदों का निर्वहन किया, साथ ही उन्होंने मुख्यमंत्री के सचिव पद की जिम्मेदारी भी पूरी निष्ठा से संभाली। गृह निर्माण एवं अधोसंरचना विकास मंडल के आयुक्त रहते हुए उन्होंने सरकारी जमीनों के बेहतर उपयोग के लिए पुनर्घनत्वीकरण की नीति लागू की। आज यह योजना देश भर में लोकप्रिय है, जिसके माध्यम से बिना सरकारी खजाने से एक भी पैसा खर्च किए प्रदेश के सैकड़ों जर्जर सरकारी कार्यालयों की सूरत बदल दी गई। जब वे नगरीय प्रशासन विभाग के आयुक्त थे, तब उनके कुशल मार्गदर्शन में 'स्वच्छ सर्वेक्षण 2023' में मध्य प्रदेश को देश के दूसरे सबसे स्वच्छ राज्य का पुरस्कार मिला, और इंदौर शहर ने लगातार 7वीं बार देश के सबसे स्वच्छ शहर का गौरव हासिल किया। इसके साथ ही पीएम स्वनिधि और पीएम आवास योजना के क्रियान्वयन में भी मध्य प्रदेश देश में नंबर वन रैंक पर रहा। इसी विभाग में सेवा के दौरान एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी की अनुशासनहीनता पर जब मातहत अधिकारियों ने उसे नौकरी से बर्खास्त करने की अनुशंसा की, तब मामला आयुक्त भरत यादव के पास पहुंचा। उन्होंने फाइल पर एक बेहद संवेदनशील टिप्पणी लिखते हुए उस गरीब कर्मचारी की नौकरी बचा ली, हालांकि अनुशासन बनाए रखने के लिए उसका स्थानांतरण कर नियमानुसार सजा भी दी।
वर्तमान में भरत यादव मध्य प्रदेश सड़क विकास निगम के प्रबंध संचालक के रूप में तकनीक, आधुनिकता, पर्यावरण संरक्षण फ्रेंडली निर्माण, पारदर्शिता के लिए अभूतपूर्व कार्य कर रहे हैं। उन्होंने सड़क निर्माण, परियोजना योजना और यातायात प्रबंधन में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डेटा एनालिटिक्स और ड्रोन सर्वे जैसी उन्नत तकनीकों को शामिल किया है। सड़क चौड़ीकरण के दौरान उन्होंने पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता देते हुए करीब 2.57 लाख से अधिक पौधे लगाए गए हैं, जिनकी सैटेलाइट से जियो-मैपिंग की जा रही है। साथ ही, उन्नत ट्री-shifting तकनीक अपनाकर 85% पुराने पेड़ों को कटने से बचाकर दूसरी जगह सफलतापूर्वक जीवित रखा गया है। जल संरक्षण की दिशा में उनकी सबसे अनूठी पहल सड़क खुदाई से निकले गड्ढों को 521 तालाबों (लोक कल्याण सरोवरों) के रूप में निर्मित किया जा रहा है, जिनकी रीयल-टाइम निगरानी सैटेलाइट और LiDAR तकनीक से की जा रही है। सुरक्षा के मोर्चे पर उन्होंने राज्य राजमार्गों के लिए अत्याधुनिक 'ARS 2.0' दुर्घटना प्रतिक्रिया प्रणाली और जीपीएस-सक्षम एम्बुलेंस सेवाओं की भी शुरुआत की है। उज्जैन में होने वाले सिंहस्थ 2028 के मद्देनजर इंदौर—उज्जैन ग्रीनफील्ड हाइवे, हरिफाटक ब्रिज चौड़ीकरण, इंगोरिया—उन्हेल हाईवे जैसी कई मेगा परियोजनाओं को समय-सीमा में संचालित करवाने का श्रेय भी भरत यादव के नेतृत्व को ही जाता है। इन विकास कार्यों से न केवल श्रद्धालुओं का सफर आसान होगा, बल्कि ग्रामीण किसानों की मुख्य मंडियों में आसान पहुंच और बड़े शहरों से संपर्क के साथ किसानों की आय बढ़ाने के रास्ते भी यहीं से होकर गुजरेंगे। परिणाम-उन्मुख दृष्टिकोण, प्रशासनिक दृढ़ता, मानवीय संवेदनशीलता और सुशासन के अनूठे संगम वाले जन-जन के इस लोकप्रिय जनसेवक को जन्मदिन की आत्मीय बधाई और असीम शुभकामनाएं।
By Dr. Deepak Rai
Senior Indian Administrative Service (IAS) officer of the 2008 Madhya Pradesh cadre, Bharat Yadav, needs no introduction. Born on June 20, 1981, in the Datia district, his life serves as a profound inspiration for youth aiming to carve a distinct identity in society through sheer hard work, dedication, and resilience. On the special occasion of his birthday, it is only fitting to reflect upon his extraordinary contributions, deeply empathetic nature, and public-centric innovations in administrative service. Truly embodying the proverb 'coming events cast their shadows before', Bharat Yadav exhibited an exceptionally sharp mind since childhood, easily clearing the rigorous Navodaya Vidyalaya entrance exam in just the 5th grade. He later pursued his higher education in English Literature (BA) and Political Science (MA). His unyielding passion for learning is evident from the fact that he continued his intense studies while managing the demanding shifts of a TTE in the Indian Railways, eventually making it into the country's most prestigious Civil Services.
Following his entry into the IAS, Bharat Yadav was initially posted as Assistant Collector in Alirajpur. He went on to serve as Assistant Collector in Hoshangabad, SDM in Multai, CEO of the Zilla Panchayat in Narsinghpur, Deputy Secretary of Urban Administration, and Project Director for 'Uday'. His result-oriented working style resonated so strongly with both the administration and the public that he was appointed Collector across 7 critical districts: Seoni, Balaghat, Jabalpur, Morena, Gwalior, Chhindwara, and Narsinghpur. Throughout this extensive administrative journey, he never allowed bureaucratic red tape or administrative arrogance to overshadow his work. The doors of his office always remained wide open for the common citizen standing at the end of the line, and no visitor ever had to wait long to meet him. His first tenure as Collector was in Seoni, where he set benchmarks for good governance that citizens remember to this day. In 2015, during a visit to a school for visually impaired children, he noticed severe mismanagement caused by financial constraints. He immediately championed social participation, organizing a charity show that successfully mobilized around ₹1.5 crore through community contribution, transforming the lives of those specially-abled children.
Moreover, taking spontaneous cognizance of a media report, he designed a dedicated 'Rehabilitation Scheme' for mentally challenged individuals wandering homeless on the streets. They were sent to Gwalior for specialized treatment, and as a result, two of them recovered completely and are now leading dignified lives with their families. During an era when Facebook was emerging as a popular social media platform, he remained personally active on it; citizens would text their grievances directly via Messenger, and he would promptly dispatch relevant officials to the spot, even ensuring that pictures of the resolved issues were posted online.
Bharat Yadav’s second posting was as Collector of Balaghat, where he set a unique record by organizing a mass wedding for 151 specially-abled couples. He frequently ventured into the district's most remote and inaccessible villages—places where no administrative officer had set foot since independence. During his tenure in Morena, he regularly visited schools and colleges to interact with students and mentor them on career paths. He established a specialized library and arranged athletic equipment for local youth preparing for army recruitment. His welfare initiatives during his posting as Collector of Gwalior also form a long, noteworthy list.
When the global COVID-19 pandemic struck and the crisis was deepening, as the Jabalpur Collector, he enforced highly proactive lockdown measures and strict SOPs across the district, which is connected to the country's longest National Highway. This successful 'Jabalpur Model' was later replicated across other districts in the state. During the first wave, he created an unprecedented record by distributing dry rations to over one lakh needy people through community mobilization, ranking Jabalpur 5th nationally and 1st within Madhya Pradesh. In the same turbulent period, while serving as the Narsinghpur Collector, he displayed immense compassion. At a time when officials typically avoided direct contact, Bharat Yadav put himself at risk, donned a PPE kit, and walked straight into the COVID wards of the district hospital to check on patients, boosting the morale of the frontline medical staff.
Following his district tenures, Bharat Yadav shouldered responsibilities in prominent state-level positions as Managing Director of the Energy Development Corporation, Commissioner of the M.P. Housing and Infrastructure Development Board, and Commissioner of the Urban Administration Department, alongside handling duties as Secretary to the Chief Minister with utmost integrity. As the Housing Board Commissioner, he introduced a pioneering policy of 'Redensification' for the optimal utilization of government land. This model has gained widespread popularity across the country today, successfully revamping hundreds of dilapidated government offices across the state without spending a single penny from the government exchequer. Later, under his leadership as the Commissioner of the Urban Administration Department, Madhya Pradesh secured the 2nd prize nationally in 'Swachh Survekshan 2023', while Indore clinched the title of the cleanest city for the 7th consecutive time. Additionally, Madhya Pradesh ranked number one in the implementation of the PM Swanidhi and PM Awas Yojana. Showing his innate empathy during this tenure, when lower officials recommended dismissing a fourth-class employee over disciplinary issues, Yadav stepped in. He added a highly compassionate note on the file, saving the poor employee's job while maintaining organizational discipline by transferring him as a corrective measure.
Currently, as the Managing Director of the Madhya Pradesh Road Development Corporation (MPRDC), Bharat Yadav is performing exceptionally to introduce technology, modernization, eco-friendly construction, and transparency to the sector. He has integrated advanced technologies like Artificial Intelligence (AI), data analytics, and drone surveys into road construction, project planning, and traffic management. Prioritizing environmental conservation during road widening projects, over 2.57 lakh saplings have been planted under his supervision, all of which are being geo-mapped via satellite. Furthermore, by adopting advanced tree-shifting techniques, 85% of old trees have been successfully transplanted and saved from being axed. In a remarkably unique water conservation initiative, the hollow pits left behind after road excavations are being systematically converted into 521 ponds (Lok Kalyan Sarovars), monitored in real-time using satellite and LiDAR technology.
On the safety front, he has launched the state-of-the-art 'ARS 2.0' Accident Response System on state highways, complete with GPS-enabled ambulances. Ahead of the upcoming Simhastha 2028 in Ujjain, the credit for driving mega-projects like the Indore–Ujjain Greenfield Highway, the widening of Harifatak Bridge, and the Ingoria–Unhel Highway strictly within their timelines goes to Bharat Yadav's leadership. These infrastructure developments will not only ease the journey for millions of devotees but will also open paths for rural farmers to easily access central markets, connect with major cities, and significantly boost their agricultural income. Heartfelt birthday greetings and endless best wishes to this popular, public-spirited leader who beautifully blends a result-oriented approach, administrative grit, human empathy, and exemplary governance!
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| The excellent work done by Deepak Saxena during his tenure as Collector. |
संस्कारधानी जबलपुर में लगभग 20 महीनों तक कलेक्टर रहे दीपक सक्सेना का कार्यकाल कभी न भुलाने वाला होगा। जन-केंद्रित दृढ़ता और रचनात्मकता के साथ प्रशासन को बदलकर उन्होंने जिले में सुशासन की नई कहानी लिखी। प्रशासनिक सख्ती, जनसेवा, और विशेष रूप से 'स्कूल माफिया' के खिलाफ की गई ऐतिहासिक कार्रवाई के लिए हमेशा याद रखा जाएगा। अपने छोटे से कार्यकाल में उन्होंने जो बड़े सुधार किए, वे न केवल मध्य प्रदेश के किसी जिले में पहले कभी नहीं हुए थे, बल्कि देशभर के लिए एक नजीर बन गए। अब वे जनसंपर्क आयुक्त की जिम्मेदारी संभालेंगे।
*प्रशासनिक सख्ती और 70 से अधिक कार्रवाई :* जबलपुर में अपने 20 महीनों के दौरान, कलेक्टर सक्सेना ने प्रशासनिक सख्ती का परिचय देते हुए भ्रष्टाचार, अव्यवस्था और अनुशासनहीनता के खिलाफ 70 से ज्यादा कार्रवाई कीं। उन्होंने निजी स्कूलों की मनमानी पर लगाम कसते हुए शिक्षा व्यवस्था में सुधार को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि बताया। उनकी सख्ती का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि कलेक्टर की कार्रवाई के चलते कई स्कूलों के प्रमुखों को जेल हुई और कई स्कूलों को अभिभावकों से ली गई अतिरिक्त फीस वापस करनी पड़ी।
*दुर्लभ अधिकारी, जिसने लोगों का दिल जीता :* दीपक सक्सेना का जब जबलपुर से भोपाल तबादला हुआ तो सोशल मीडिया पर नागरिकों ने खुलकर भावनाएं व्यक्त की। यह किसी अधिकारी के लिए दुर्लभ सम्मान है। मेरे पत्रकारिता के 16 वर्षों के अनुभव में, मैंने महसूस किया कि ऐसे अधिकारी विरले ही देखे हैं जिनके तबादले से नागरिक इतने दुखी हों। लोग चाहते थे कि शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में उन्होंने जो सुधार किए हैं, वे कार्य हमेशा चलते रहें। लेकिन एक आईएएस अधिकारी हमेशा ही एक जिले का कलेक्टर नहीं रह सकता। बस यही उम्मीद है कि जो भी नया कलेक्टर आए वह इस नवाचार को आगे बढ़ाते रहे।
*रणनीति जिसने तोड़ी 'स्कूल माफिया' की कमर :* दीपक सक्सेना ने खुद सार्वजनिक रूप से बताया था कि उन्होंने अपने एक्शन को सफल बनाने के लिए एक खास रणनीति अपनाई। उन्होंने अलग-अलग डिपार्टमेंट को जोड़ा - पुलिस, एजुकेशन, रेवेन्यू। सबको अलग-अलग काम दिए और फिर लास्ट में एक लेवल पर लाए। उन्होंने बताया कि इसका प्रभाव बहुत अच्छा रहा। पुलिस के सहयोग से जो FIR दर्ज हुई और तत्काल अरेस्टिंग की जो कार्रवाई हुईं, उससे उसका मैसेज बहुत तगड़ा गया। यह कार्रवाई इसलिए भी सराही गई क्योंकि किसी दूसरे जिले में उस पर कार्रवाई कभी नहीं हुई थी, जिससे लोगों को भारी परेशानी थी।
पुस्तक मेला के नवाचार को मिला प्रदेशव्यापी रंग : सक्सेना के कार्यकाल का एक और महत्वपूर्ण नवाचार जबलपुर में आयोजित किया गया पुस्तक मेला था। यह पहली बार था जब कलेक्टर की पहल पर यह मेला लगाया गया, जिसमें डिस्काउंट रेट पर कॉपी किताबों के साथ स्कूल यूनिफार्म और स्कूल बैग की बिक्री की गई। इस नवाचार का उद्देश्य निजी स्कूलों, प्रकाशकों और किताब विक्रेताओं की साठगांठ को तोड़ना था। मेरी बहन, जो जबलपुर में रहती हैं, ने बताया कि पिछले वर्ष जो किताबें उन्हें ₹4000 में मिली थीं, वही किताबें पुस्तक मेले में उन्हें मात्र ₹1100 से ₹1200 में मिल गईं। यह बचत सीधे तौर पर नवाचार की सफलता को दर्शाती है।
कलेक्टर दीपक सक्सेना का कहना था कि यह जरूरी नहीं है कि हर बार राज्य सरकार ही आदेश जारी करे और उसका पालन किया जाए। कई बार जिला स्तर पर भी कोई नवाचार होता है तो राज्य सरकार उसको प्रदेश में लागू करती है। यही पुस्तक मेले के साथ हुआ।
प्रदेश सरकार से मिली सराहना : जबलपुर के पुस्तक मेले के इस नवाचार की राज्य सरकार ने भी तारीफ की। सरकार के स्कूल एजुकेशन विभाग ने तय किया है कि जल्द ही पूरे प्रदेश में जिला स्तर पर ऐसी पुस्तक मेले लगाए जाएंगे। राज्य शासन के स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा जिला कलेक्टरों को दिये गये निर्देशों में कहा गया है कि अगर उनके जिले में निजी स्कूलों, प्रकाशकों और किताब विक्रेताओं की साठगांठ के कारण विद्यार्थियों और अभिभावकों को परेशानी हो रही है तो स्थानीय परिस्थितियों का आंकलन कर प्रत्येक जिले में उपयुक्त स्थान का चयन कर यथाशीघ्र इसका आयोजन किया जाए। दीपक सक्सेना का यह 20 महीनों का कार्यकाल बताता है कि एक अधिकारी कैसे जन-केंद्रित दृढ़ता और रचनात्मकता के साथ प्रशासन को बदलकर एक बड़ा और सकारात्मक प्रभाव छोड़ सकता है, जिसकी छाप लंबे समय तक रहती है।
रिकॉर्ड रूम हुआ ऑनलाइन, प्रदेश में 'नंबर वन' स्थान
कलेक्टर दीपक सक्सेना ने प्रशासन में पारदर्शिता और कार्यक्षमता बढ़ाने की दिशा में एक अभूतपूर्व पहल करते हुए कलेक्टर कार्यालय के रिकॉर्ड रूम को पूरी तरह से ऑनलाइन कर दिया। पहले, पुराने रिकॉर्ड फाइलों में धूल खाते पड़े रहते थे, जिन्हें खोजने में कर्मचारियों का काफी समय बर्बाद होता था। अब रिकॉर्ड ऑनलाइन होने से यह प्रक्रिया सरल और त्वरित हो गई है, जिससे आम जनता और कर्मचारियों दोनों को लाभ मिल रहा है। दीपक सक्सेना की इस डिजिटलीकरण की पहल को पूरे प्रदेश में नंबर वन स्थान प्राप्त हुआ है और इसे अब सभी जिलों में लागू किया जा रहा है। उनका मानना है कि लोगों के साथ कम्युनिकेशन बढ़ाना और मेहनत पर भरोसा रखना ही सफलता की कुंजी है। दीपक सक्सेना की तबादले के बाद जबलपुर जिले के नागरिकों के मन में आने वाले भाव को शायर वसीम बरेलवी का यह शेर लाल बेहतर तरीके से प्रकट कर सकता है -
"जहाँ जाएगा वहीं रोशनी लुटाएगा,
इस चिराग का अपना कोई मकान नहीं होता।"
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| The excellent work done by Deepak Saxena during his tenure as Collector. |
फिल्म 'नायक' का क्लाइमेक्स वह तीखा इंटरव्यू था जिसने भ्रष्ट मुख्यमंत्री के भ्रष्टाचार को उजागर कर दिया था और जनता को जागृत किया था। कलेक्टर दीपक सक्सेना ने इसी तर्ज पर, लेकिन अधिक प्रभावी और आधुनिक ढंग से, गोपनीयता और पारदर्शिता का अस्त्र उठाया। उन्होंने अभिभावकों को शिकायत करने के लिए सीधे अपना औपचारिक 'टोल-फ्री' नंबर या दफ्तर का चक्कर काटने की सलाह नहीं दी, बल्कि एक आधुनिक और गोपनीय हथियार, व्हाट्सएप नंबर 9407083130 को सार्वजनिक कर दिया।
यह कदम उस दृश्य जैसा था, जब नायक (अनिल कपूर) जनता से सीधे जुड़कर उनकी समस्याएँ सुनता है, बिना किसी बिचौलिए के। कलेक्टर ने सीधे अभिभावकों से सबूत मांगे। उन्होंने स्पष्ट निर्देश दिया: "स्कूल प्रबंधन द्वारा औपचारिक या अनौपचारिक रूप से दिए गए निर्देशों या सलाह, सूचना, कार्ड अथवा स्कूल के अंदर या बाहर लगे पोस्टर, पंपलेट या बैनर की रिकॉर्डिंग या इमेज अपने मोबाइल से संबंधित व्हाट्सएप नंबर पर भेजें।" इस 'व्हाट्सएप क्रांति' ने देश में पहली बार प्राइवेट स्कूलों की कमीशनखोरी को इतनी व्यापकता और प्रमाणिकता के साथ उजागर करने का मार्ग प्रशस्त किया। शिक्षा माफियाओं को अंदाज़ा भी नहीं था कि एक कलेक्टर 'नायक' की तरह सीधे जनता के मोबाइल तक पहुँच जाएगा और उनके गुप्त 'कमीशन' वाले खेल को खत्म कर देगा। इस पहल ने प्रशासनिक मशीनरी और आम नागरिक के बीच एक सीधा और भरोसेमंद पुल बना दिया।
फिल्म 'नायक' में अनिल कपूर ने भ्रष्ट अधिकारियों को तत्काल सज़ा दी थी, बिना किसी देरी के। कलेक्टर सक्सेना ने भी जबलपुर में उसी तेज़ी और दृढ़ता के साथ कार्रवाई की। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में शिक्षा माफिया और स्कूलों के इस गठजोड़ को तोड़ने का ऐलान किया। जब कलेक्टर को पता चला कि जबलपुर के नामी निजी स्कूल, बच्चों के भविष्य की परवाह न करते हुए, केवल कमीशन के लालच में घटिया 'सी' और 'डी' कैटेगरी के प्रकाशकों की किताबें और यूनिफॉर्म निर्धारित कर रहे थे, तो उन्होंने इस पर कड़ा संज्ञान लिया। यह शिक्षा के मंदिर को व्यापारिक मंडी बनाने जैसा था, जहाँ गुणवत्ता को ताक पर रखकर सिर्फ मुनाफा कमाया जा रहा था, जिसे कलेक्टर सक्सेना ने ध्वस्त कर दिया।
जैसे ही कार्रवाई शुरू हुई, 'नायक' फिल्म की तरह, जब नायक (कलेक्टर) कड़ी कार्रवाई करता है, तो विरोधी कानूनी दांव-पेंच खेलने की कोशिश करते हैं। जबलपुर के स्कूल संचालक भी प्रशासन के फीस वापसी के आदेश के खिलाफ हाई कोर्ट (HC) चले गए, ताकि इस फैसले पर स्टे (रोक) लगवाया जा सके। लेकिन उन्हें वहाँ भी बड़ा झटका लगा- हाई कोर्ट ने फिलहाल इस मामले में दखल देने से इनकार कर दिया और जनहित में कलेक्टर के आदेश को प्रभावी बनाए रखा। यह सत्य और जनहित की बड़ी जीत थी।
कलेक्टर सक्सेना की दृढ़ता का परिणाम जल्द ही सामने आया। जबलपुर में 11 प्राइवेट स्कूलों को अभिभावकों से ली गई अतिरिक्त और कमीशन वाली फीस लौटाने के आदेश दिए गए। इस आदेश के तहत 80 करोड़ रुपए से ज्यादा की राशि अभिभावकों को वापस करनी थी। यह राशि सिर्फ एक आंकड़ा नहीं थी, बल्कि यह शिक्षा माफिया के अनैतिक मुनाफे का पैमाना थी, जिसे कलेक्टर ने जनता के बीच वापस पहुँचाने का ऐतिहासिक काम किया। यह कार्रवाई बताती है कि यदि प्रशासन चाहे तो अभिभावकों को आर्थिक शोषण से मुक्ति दिला सकता है।
एक परिजन ने जो कमेंट सोशल मीडिया पर किया, वह हर मध्यमवर्गीय परिवार की भावना थी: "मगर किसी भी कलेक्टर के अंदर इतनी दम नहीं थी कि वह इन स्कूलों के खिलाफ कार्रवाई कर सके... आप बहुत ही अच्छा और नेक काम कर रहे हैं।" जब एक प्रशासनिक अधिकारी 'नायक' की तरह जनहित में काम करता है, तो पूरे देश का ध्यान उस पर जाता है।
कलेक्टर दीपक सक्सेना की निडरता और जनसेवा की भावना को देखकर स्वयं मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव भी प्रभावित हुए। उन्होंने सार्वजनिक मंच से कलेक्टर दीपक सक्सेना की तारीफ करते हुए कहा कि "सभी जिलों के कलेक्टरों को दीपक सक्सेना से सीखना चाहिए।" यह मुख्यमंत्री की ओर से मिला वह सर्वोच्च सम्मान था, जो उनकी बहादुरी, जनसेवा और उत्कृष्ट प्रशासनिक क्षमता को 'वीआईपी' सर्टिफिकेट देता है। यह तारीफ पूरे राज्य के प्रशासनिक अधिकारियों के लिए एक स्पष्ट संदेश भी थी कि जनहित सर्वोपरि है।
कलेक्टर दीपक सक्सेना की निडरता का चरम तब दिखा जब निजी स्कूलों की मनमानी फीस वृद्धि पर सख्त कार्रवाई करते हुए, जॉय सीनियर सेकेंडरी स्कूल के प्रबंधन के विरुद्ध FIR दर्ज की गई और स्कूल के अध्यक्ष तथा सचिव को गिरफ्तार किया गया। यह कार्रवाई सीधे तौर पर 'नायक' की याद दिलाती है, जहाँ भ्रष्टाचारियों को उनके पद और रुतबे की परवाह किए बिना, कानून के सामने लाया जाता है। कलेक्टर दीपक सक्सेना ने यह साबित कर दिया है कि देश को एक दिन का 'नायक' नहीं, बल्कि हर दिन ईमानदारी, साहस और जनसेवा की भावना के साथ काम करने वाले प्रशासनिक अधिकारियों की ज़रूरत है। वह केवल एक कलेक्टर नहीं, बल्कि शिक्षा के क्षेत्र में बदलाव लाने वाले एक सच्चे 'रोल मॉडल कलेक्टर दीपक सक्सेना' हैं, जिन्होंने अपनी प्रशासनिक शक्ति से लाखों अभिभावकों के चेहरे पर मुस्कान ला दी है और एक नई मिसाल कायम की है।
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| IAS Deepak Saxena Best Work During Collector Period |
'एक्शन स्पीक लाउडर देन वर्ड्स' इस अंग्रेजी कहावत का हिंदी अनुवाद है- 'कथनी से ज़्यादा करनी असर करती है।' अलग अर्थों में देखा जाये तो 'बातें कम, काम ज़्यादा।' हम संदर्भ के अनुसार इनमें से किसी का भी उपयोग कर सकते हैं। यह वाक्य मध्यप्रदेश के मुखिया डॉ. मोहन यादव और जबलपुर के कलेक्टर दीपक सक्सेना पर खरा उतरता है। जनवरी 2024 में जबलपुर कलेक्टर का पदभार संभालते ही, आईएएस दीपक सक्सेना ने अंग्रेजी की प्रसिद्ध कहावत 'एक्शन स्पीक्स लाउडर देन वर्ड्स' (Actions Speak Louder Than Words) को सही मायनों में चरितार्थ कर दिया है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के 'स्वतंत्रता से काम' करने के आह्वान के ठीक दो महीने बाद, जबलपुर ने एक ऐसी घटना देखी है, जिसकी कल्पना आसानी से नहीं की जा सकती। 17 दिसंबर 2023 को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद से ही डॉ. मोहन यादव अपनी कार्यशैली में ब्यूरोक्रेसी पर कठोर नियंत्रण के लिए जाने जा रहे हैं। उन्होंने कई जिलों के कलेक्टरों को बदला है। इस प्रशासनिक फेरबदल का सीधा असर अब निचले स्तर तक दिखाई दे रहा है। मुख्यमंत्री ने 1 अप्रैल को एक बड़ा जनहितैषी आदेश जारी किया था, जिसका उद्देश्य निजी स्कूलों की मनमानी पर लगाम लगाना था। इस आदेश में स्पष्ट कहा गया था कि प्राइवेट स्कूल प्रबंधन किसी निर्धारित दुकान से ही किताब, यूनिफॉर्म या अन्य शिक्षण सामग्री खरीदने के लिए अभिभावकों पर दबाव नहीं बना सकता है। अगर ऐसा होता है, तो स्कूल प्रबंधन के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
इस आदेश के पहले ही जबलपुर में कुछ बड़े एक्शन की तैयारी चुपचाप चल रही थी और इसका नेतृत्व एक ऐसा अधिकारी कर रहा था, जिसने पूरे देश में हलचल मचा दी। उन अधिकारी का नाम था— दीपक सक्सेना। दरअसल, उन्होंने कलेक्टरी संभालते ही जिले में सुधार की कई पहल प्रारंभ कर दी थीं। जबलपुर की शिक्षा व्यवस्था पर सबसे बड़ा और निर्णायक एक्शन भोपाल के बजाय जबलपुर में कलेक्टर दीपक सक्सेना द्वारा लिया गया है। कलेक्टर दीपक कुमार सक्सेना ने मुख्यमंत्री के आदेश का तत्काल और कड़ा अनुपालन करते हुए जबलपुर की कुल 18 निजी स्कूलों के खिलाफ पुलिस में प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज करने का निर्देश दे दिया। यह कार्रवाई कोई सामान्य रूटीन जांच नहीं थी, बल्कि सीधे अभिभावकों से मिल रही गंभीर शिकायतों का परिणाम थी। दरअसल, दीपक सक्सेना ऐसे अधिकारी हैं जो सीधे जनता से मिलते हैं, कोई भी आम आदमी उनके मिलकर अपनी व्यथा सुना सकता है, सलाह दे सकता है। बहुमुखी प्रतिभा के धनी सक्सेना कुछ सलाहों पर अमल भी लाते हैं। पिछले दिनों जबलपुर जिले के कुछ अभिभावकों ने अपनी शिकायतों में कलेक्टर को बताया था कि कई निजी स्कूल प्रबंधन उन्हें उनकी बताई हुई दुकानों से ही यूनिफॉर्म, किताबें और स्टेशनरी खरीदने के लिए मजबूर कर रहे हैं। शिकायतकर्ताओं ने यह भी खुलासा किया कि इन 'निर्धारित' दुकानों पर इन वस्तुओं की कीमतें बाजार मूल्य से काफी अधिक थीं, जिससे उन पर अनावश्यक वित्तीय बोझ पड़ रहा था। कलेक्टर सक्सेना ने इन शिकायतों को गंभीरता से लिया। उन्होंने एक गुप्त और त्वरित जाँच टीम गठित करवाई। जब जाँच में अभिभावकों की शिकायतें सही पाई गईं, तो उन्होंने बिना किसी देरी के, मनमानी करने वाले 18 स्कूलों के खिलाफ FIR दर्ज करने के आदेश जारी कर दिए। इस कार्रवाई ने न केवल जबलपुर बल्कि पूरे मध्य प्रदेश में शिक्षा जगत को हिलाकर रख दिया है। एक ही झटके में इतनी बड़ी संख्या में स्कूलों पर FIR दर्ज होना, कलेक्टर सक्सेना के सख्त और निडर प्रशासनिक रवैये को दर्शाता है। आईएएस
दीपक सक्सेना का प्रशासनिक रिकॉर्ड हमेशा से ही पारदर्शिता और त्वरित कार्रवाई का रहा है। जनवरी 2024 में जबलपुर की कमान संभालने के बाद, उन्होंने कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर तत्काल कार्रवाई की है।
स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार: कलेक्टर सक्सेना ने जबलपुर के सरकारी अस्पतालों का औचक निरीक्षण किया और सुविधाओं में कमी पाए जाने पर जिम्मेदार अधिकारियों को तत्काल फटकार लगाई। उनका जोर स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता को सुधारने पर रहा है।
सरकारी भूमि अतिक्रमण पर कार्रवाई: उन्होंने अवैध अतिक्रमणों के खिलाफ भी कड़ा रुख अपनाया है, सरकारी जमीनों को मुक्त कराने और भू-माफियाओं पर नकेल कसने के लिए विशेष अभियान चलाए हैं।
जनसुनवाई को प्रभावी बनाना: उन्होंने जनसुनवाई कार्यक्रमों को केवल औपचारिकता न रखकर, नागरिकों की समस्याओं का त्वरित समाधान सुनिश्चित करने पर जोर दिया है।
लेकिन प्राइवेट स्कूलों की मनमानी पर देश में पहली बार इतनी अच्छी कार्रवाई करने का श्रेय दीपक सक्सेना को ही मिला। प्राइवेट स्कूलों के खिलाफ FIR की यह कार्रवाई, उनके 'जन-हित प्रथम' सिद्धांत को पुष्ट करती है। इस एक्शन ने न केवल अभिभावकों को बड़ी राहत दी है, बल्कि नौकरशाही में एक मजबूत संदेश भी दिया है कि सीएम मोहन यादव के आदेशों की अनदेखी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। कलेक्टर सक्सेना की इस पहल पर अब हर जगह उनकी चर्चा हो रही है और उन्हें एक ऐसे अधिकारी के रूप में देखा जा रहा है जो केवल आदेश नहीं देता, बल्कि उन्हें कार्रवाई में बदलता है।
सीएम डॉ. मोहन यादव के 2 वर्ष : विकास, सेवा और सांस्कृतिक अभ्युदय के दावों का डाटा एनालिसिस
डॉ. दीपक राय
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| Dr Deepak Rai Article about CM Mohan Yadav Work |
मध्यप्रदेश में डॉ. मोहन यादव की प्रदेश भाजपा सरकार के कार्यकाल को आज 2 वर्ष पूरे हो गए हैं। यह अवधि केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि संकल्प और सिद्धि के बीच की एक गतिशील यात्रा दिखती है। सरकार का दावा है कि उसने 'विकास और सेवा' के मूल मंत्र को अपनाते हुए, प्रदेश को देश के विकास के इंजन के रूप में स्थापित करने की दिशा में ठोस कदम उठाए हैं। कुछ तथ्यों के साथ उपरोक्त दावे का परीक्षण करना जरूरी है।
औद्योगिक विकास और रोजगार सृजन : वर्ष 2025 को 'उद्योग एवं रोजगार वर्ष' घोषित किया गया है। 18 नई नीतियों की मंजूरी से राज्य में ₹32 लाख करोड़ से अधिक का निवेश सुनिश्चित हुआ और ₹8.57 लाख करोड़ के प्रस्ताव धरातल पर उतरे। 'एमपी इंवेस्ट पोर्टल 3.0' के कारण मध्य प्रदेश सर्वाधिक निवेश प्रस्ताव लाने वाला देश का तीसरा राज्य बन गया। इन्वेस्टर मीट से 23 लाख से अधिक रोजगार सृजन प्रस्ताव प्राप्त हुए। धार में देश के पहले पीएम मित्र पार्क का भूमिपूजन हुआ, और 26 नए औद्योगिक पार्क/क्लस्टर को मंजूरी दी गई।
महिला सशक्तिकरण : लाड़ली बहना योजना की राशि ₹1,000 से बढ़कर ₹1,500 प्रतिमाह की गई, शासकीय सेवाओं में महिलाओं का आरक्षण बढ़ाकर 35 प्रतिशत किया गया। देवी अहिल्या नारी सशक्तिकरण मिशन प्रारम्भ हुआ, और 62 लाख ग्रामीण बहनें आत्मनिर्भर हुईं।
गरीब कल्याण : गरीब कल्याण मिशन के तहत 1 करोड़ 33 लाख परिवारों को निःशुल्क खाद्यान्न वितरित किया गया। इंदौर की हुकुमचंद मिल के श्रमिक परिवारों को करोड़ों रुपये का भुगतान कर दशकों पुराना विवाद सुलझाया गया। स्वामित्व योजना से बड़ी संख्या में लोगों को स्वामित्व अधिकार पत्र मिले। मुख्यमंत्री जन कल्याण संबल योजना और PMGKAY के तहत करोड़ों हितग्राहियों को सहायता और निःशुल्क अनाज वितरित किया गया।
जनजातीय कल्याण : जनजातीय वर्ग के लिए बजट में 23.4% की बढ़ोतरी के साथ ₹40 हजार 804 करोड़ का प्रावधान किया गया। तेंदूपत्ता संग्राहकों का पारिश्रमिक ₹3,000 से बढ़ाकर ₹4,000 प्रति मानक बोरा किया गया। पीएम जनमन योजना के तहत मोबाइल मेडिकल यूनिट और आवास पूरे किए गए। सांस्कृतिक पहचान में, पचमढ़ी अभयारण्य का नाम राजा भभूत सिंह के नाम पर, और जबलपुर एयरपोर्ट का नाम वीरांगना रानी दुर्गावती के नाम पर किया गया। भगोरिया नृत्य, गोंड भित्तिचित्र कला और नर्मदा परिक्रमा को राष्ट्रीय अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल किया गया। 1,450 कि.मी. लंबे राम वन गमन पथ का निर्माण होगा। सिंहस्थ-2028 के लिए ₹2,005 करोड़ का प्रावधान किया गया है।
किसान, पशुपालन : कृषि उत्पादन में मध्यप्रदेश दलहन, तिलहन, मक्का, टमाटर उत्पादन में देश में प्रथम स्थान पर है। कृषक कल्याण मिशन और दाल मिशन को मंजूरी दी गई। पीएम किसान सम्मान निधि तथा सीएम किसान कल्याण योजना के तहत कृषकों के खातों में ₹48 हजार करोड़ से अधिक की राशि का अंतरण हुआ। आपदा प्रभावित लाखों किसानों को ₹2,106 करोड़ से अधिक की राशि प्रदान की गई। किसानों को राहत देते हुए, गेहूं के न्यूनतम समर्थन मूल्य पर बोनस दिया गया। 30 लाख सोलर पंप उपलब्ध कराने का लक्ष्य है। पशुपालन क्षेत्र में, “स्वावलंबी गो-शाला कामधेनु स्थापना नियम-2025” स्वीकृत हुआ और प्रति गो-वंश मिलने वाली राशि ₹20 से बढ़ाकर ₹40 की गई।
अधोसंरचना एवं परिवहन : सिंचाई क्षमता को वर्ष 2028-29 तक 100 लाख हेक्टेयर तक बढ़ाने का लक्ष्य है। देश की पहली नदी-जोड़ो केन-बेतवा लिंक परियोजना का भूमि-पूजन हुआ। ऊर्जा में, मध्यप्रदेश सरप्लस की स्थिति में है, जिसमें फ्लोटिंग सोलर पॉवर प्रोजेक्ट ने 278 मेगावॉट क्षमता से उत्पादन शुरू किया। परिवहन में, हवाई अड्डों की संख्या 8 हो गई है। अगले 5 वर्ष में 1 लाख किलोमीटर सड़कों का निर्माण होगा। NHAI और मध्यप्रदेश के बीच ₹1 लाख करोड़ का एमओयू हुआ। मुख्यमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत हजारों गांव लंबी सड़कों से जुड़े।
शिक्षा, स्वास्थ्य : मध्यप्रदेश राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 लागू करने वाला देश का पहला राज्य है। 6 लाख 18 हजार बच्चे दोबारा स्कूलों में जोड़े गए। सभी 55 जिलों में एक-एक मॉडल कॉलेज को पीएम कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस के रूप में उन्नत किया जा रहा है। स्वास्थ्य में, आयुष्मान आरोग्य मंदिर और मुख्यमंत्री संजीवनी क्लीनिक संचालित हैं। 2 वर्षों में 84 लाख पात्र हितग्राहियों के आयुष्मान कार्ड बनाए गए। युवाओं के लिए 2.5 लाख भर्तियों का लक्ष्य है। 'रोजगार दिवस' पर रिकॉर्ड 7 लाख युवाओं को ₹5 हजार करोड़ रुपये का स्व-रोजगार ऋण वितरित किया गया।
सुशासन : राजस्व महाअभियान चलाकर 1 करोड़ से अधिक प्रकरणों का निराकरण किया गया। साइबर तहसील परियोजना सभी 55 जिलों में लागू हुई, जिसे प्रधानमंत्री उत्कृष्टता पुरस्कार मिला। मध्यप्रदेश त्रुटिहीन फसल गिरदावरी कराने वाला देश का पहला राज्य बन गया। सर्वाधिक खनिज ब्लॉकों की नीलामी कर देश में प्रथम स्थान प्राप्त किया गया है।
कानून व्यवस्था : देश में सबसे पहले 'ई-समन' व्यवस्था लागू की गई। नक्सल विरोधी अभियानों में 13 नक्सली ढेर हुए और 10 नक्सलियों ने सरेंडर किया। अब प्रदेश नक्सल मुक्त राज्य बन चुका है। पुलिस में शीघ्र ही 20 हजार से अधिक पदों पर भर्ती होगी।
चुनौतियां भी कम नहीं : इन सफलताओं के बावजूद, सरकार के सामने कुछ महत्वपूर्ण चुनौतियाँ हैं, जिनका हल तीसरे वर्ष में निकालना जरूरी होगा। कौशल और औद्योगिक मांग का समन्वय के लिए रिकॉर्ड औद्योगिक निवेश के लिए राज्य के श्रम बल के कौशल को नई तकनीकी मांगों के अनुरूप बनाना होगा। बुनियादी ढांचे का अंतिम छोर तक विस्तार के लिए मुख्यमंत्री मजरा-टोला सड़क योजना जैसी परियोजनाओं के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में सड़कों की गुणवत्ता और जल-जीवन मिशन जैसी योजनाओं को हर घर तक पहुंचाने में संसाधनों और निगरानी की निरंतर आवश्यकता है। योजनाओं के क्रियान्वयन में निरंतरता के लिए प्रशासनिक दक्षता और क्रियान्वयन की गति में निरंतरता बनाए रखना आवश्यक होगा। पर्यावरण और विकास का संतुलन रखने के लिए सर्वाधिक खनिज ब्लॉकों की नीलामी और तीव्र विकास के बीच, टाइगर कॉरिडोर के संरक्षण और नदी संरक्षण को संतुलित करना जरूरी होगा।
इन चुनौतियों का हल डिजिटल गवर्नेंस का विस्तार और जनभागीदारी व निगरानी को मजबूत करके ही संभव है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को अपने तीसरे वर्ष के लिए चुनौतियों से निपटने के लिए एक विशेष टास्कफोर्स बनानी होगी। 2047 तक विकसित भारत बनाने के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विजन को पूरा करने के लिए सीएम डॉ. मोहन'आत्मनिर्भर' मध्यप्रदेश बनाने के लिए मिशन मोड में कार्य करना पड़ेगा क्योंकि विकसित भारत का रास्ता विकसित मध्यप्रदेश से होकर ही गुजरेगा।