विशेष लेख
डॉ. दीपक राय, दैनिक मीडिया गैलरी, 10 अगस्त 2024, भोपाल।
रोल मॉडल IAS दीपक सक्सेना : वर्षों से निजी स्कूलों की मनमानी पर शिकंजा
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| The excellent work done by Deepak Saxena during his tenure as Collector. |
फिल्म 'नायक' का क्लाइमेक्स वह तीखा इंटरव्यू था जिसने भ्रष्ट मुख्यमंत्री के भ्रष्टाचार को उजागर कर दिया था और जनता को जागृत किया था। कलेक्टर दीपक सक्सेना ने इसी तर्ज पर, लेकिन अधिक प्रभावी और आधुनिक ढंग से, गोपनीयता और पारदर्शिता का अस्त्र उठाया। उन्होंने अभिभावकों को शिकायत करने के लिए सीधे अपना औपचारिक 'टोल-फ्री' नंबर या दफ्तर का चक्कर काटने की सलाह नहीं दी, बल्कि एक आधुनिक और गोपनीय हथियार, व्हाट्सएप नंबर 9407083130 को सार्वजनिक कर दिया।
यह कदम उस दृश्य जैसा था, जब नायक (अनिल कपूर) जनता से सीधे जुड़कर उनकी समस्याएँ सुनता है, बिना किसी बिचौलिए के। कलेक्टर ने सीधे अभिभावकों से सबूत मांगे। उन्होंने स्पष्ट निर्देश दिया: "स्कूल प्रबंधन द्वारा औपचारिक या अनौपचारिक रूप से दिए गए निर्देशों या सलाह, सूचना, कार्ड अथवा स्कूल के अंदर या बाहर लगे पोस्टर, पंपलेट या बैनर की रिकॉर्डिंग या इमेज अपने मोबाइल से संबंधित व्हाट्सएप नंबर पर भेजें।" इस 'व्हाट्सएप क्रांति' ने देश में पहली बार प्राइवेट स्कूलों की कमीशनखोरी को इतनी व्यापकता और प्रमाणिकता के साथ उजागर करने का मार्ग प्रशस्त किया। शिक्षा माफियाओं को अंदाज़ा भी नहीं था कि एक कलेक्टर 'नायक' की तरह सीधे जनता के मोबाइल तक पहुँच जाएगा और उनके गुप्त 'कमीशन' वाले खेल को खत्म कर देगा। इस पहल ने प्रशासनिक मशीनरी और आम नागरिक के बीच एक सीधा और भरोसेमंद पुल बना दिया।
फिल्म 'नायक' में अनिल कपूर ने भ्रष्ट अधिकारियों को तत्काल सज़ा दी थी, बिना किसी देरी के। कलेक्टर सक्सेना ने भी जबलपुर में उसी तेज़ी और दृढ़ता के साथ कार्रवाई की। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में शिक्षा माफिया और स्कूलों के इस गठजोड़ को तोड़ने का ऐलान किया। जब कलेक्टर को पता चला कि जबलपुर के नामी निजी स्कूल, बच्चों के भविष्य की परवाह न करते हुए, केवल कमीशन के लालच में घटिया 'सी' और 'डी' कैटेगरी के प्रकाशकों की किताबें और यूनिफॉर्म निर्धारित कर रहे थे, तो उन्होंने इस पर कड़ा संज्ञान लिया। यह शिक्षा के मंदिर को व्यापारिक मंडी बनाने जैसा था, जहाँ गुणवत्ता को ताक पर रखकर सिर्फ मुनाफा कमाया जा रहा था, जिसे कलेक्टर सक्सेना ने ध्वस्त कर दिया।
जैसे ही कार्रवाई शुरू हुई, 'नायक' फिल्म की तरह, जब नायक (कलेक्टर) कड़ी कार्रवाई करता है, तो विरोधी कानूनी दांव-पेंच खेलने की कोशिश करते हैं। जबलपुर के स्कूल संचालक भी प्रशासन के फीस वापसी के आदेश के खिलाफ हाई कोर्ट (HC) चले गए, ताकि इस फैसले पर स्टे (रोक) लगवाया जा सके। लेकिन उन्हें वहाँ भी बड़ा झटका लगा- हाई कोर्ट ने फिलहाल इस मामले में दखल देने से इनकार कर दिया और जनहित में कलेक्टर के आदेश को प्रभावी बनाए रखा। यह सत्य और जनहित की बड़ी जीत थी।
कलेक्टर सक्सेना की दृढ़ता का परिणाम जल्द ही सामने आया। जबलपुर में 11 प्राइवेट स्कूलों को अभिभावकों से ली गई अतिरिक्त और कमीशन वाली फीस लौटाने के आदेश दिए गए। इस आदेश के तहत 80 करोड़ रुपए से ज्यादा की राशि अभिभावकों को वापस करनी थी। यह राशि सिर्फ एक आंकड़ा नहीं थी, बल्कि यह शिक्षा माफिया के अनैतिक मुनाफे का पैमाना थी, जिसे कलेक्टर ने जनता के बीच वापस पहुँचाने का ऐतिहासिक काम किया। यह कार्रवाई बताती है कि यदि प्रशासन चाहे तो अभिभावकों को आर्थिक शोषण से मुक्ति दिला सकता है।
एक परिजन ने जो कमेंट सोशल मीडिया पर किया, वह हर मध्यमवर्गीय परिवार की भावना थी: "मगर किसी भी कलेक्टर के अंदर इतनी दम नहीं थी कि वह इन स्कूलों के खिलाफ कार्रवाई कर सके... आप बहुत ही अच्छा और नेक काम कर रहे हैं।" जब एक प्रशासनिक अधिकारी 'नायक' की तरह जनहित में काम करता है, तो पूरे देश का ध्यान उस पर जाता है।
कलेक्टर दीपक सक्सेना की निडरता और जनसेवा की भावना को देखकर स्वयं मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव भी प्रभावित हुए। उन्होंने सार्वजनिक मंच से कलेक्टर दीपक सक्सेना की तारीफ करते हुए कहा कि "सभी जिलों के कलेक्टरों को दीपक सक्सेना से सीखना चाहिए।" यह मुख्यमंत्री की ओर से मिला वह सर्वोच्च सम्मान था, जो उनकी बहादुरी, जनसेवा और उत्कृष्ट प्रशासनिक क्षमता को 'वीआईपी' सर्टिफिकेट देता है। यह तारीफ पूरे राज्य के प्रशासनिक अधिकारियों के लिए एक स्पष्ट संदेश भी थी कि जनहित सर्वोपरि है।
कलेक्टर दीपक सक्सेना की निडरता का चरम तब दिखा जब निजी स्कूलों की मनमानी फीस वृद्धि पर सख्त कार्रवाई करते हुए, जॉय सीनियर सेकेंडरी स्कूल के प्रबंधन के विरुद्ध FIR दर्ज की गई और स्कूल के अध्यक्ष तथा सचिव को गिरफ्तार किया गया। यह कार्रवाई सीधे तौर पर 'नायक' की याद दिलाती है, जहाँ भ्रष्टाचारियों को उनके पद और रुतबे की परवाह किए बिना, कानून के सामने लाया जाता है। कलेक्टर दीपक सक्सेना ने यह साबित कर दिया है कि देश को एक दिन का 'नायक' नहीं, बल्कि हर दिन ईमानदारी, साहस और जनसेवा की भावना के साथ काम करने वाले प्रशासनिक अधिकारियों की ज़रूरत है। वह केवल एक कलेक्टर नहीं, बल्कि शिक्षा के क्षेत्र में बदलाव लाने वाले एक सच्चे 'रोल मॉडल कलेक्टर दीपक सक्सेना' हैं, जिन्होंने अपनी प्रशासनिक शक्ति से लाखों अभिभावकों के चेहरे पर मुस्कान ला दी है और एक नई मिसाल कायम की है।

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