'कृषि कल्याण वर्ष 2026'- मुख्यमंत्री खुद गांव की पगडंडियों और खेतों की सोंधी महक लेकर आगे बढ़े हैं
प्रसंगवश
डॉ. दीपक राय, भोपाल
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| कृषक कल्याण वर्ष 2026 |
मध्यप्रदेश की धरती पर 'कृषि कल्याण वर्ष 2026' का आगाज केवल एक सरकारी घोषणा नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के उस विजन का विस्तार है जो सीधे मिट्टी से जुड़ा है। एक ऐसा नेता जिसने खुद गांव की पगडंडियों और खेतों की सोंधी महक के बीच बचपन बिताया हो, वही समझ सकता है कि किसान की उन्नति का रास्ता केवल बीज और खाद से नहीं, बल्कि बेहतर कनेक्टिविटी और वैश्विक बाजार से होकर गुजरता है...
भारतीय राजनीति में अक्सर नीतियों का निर्माण वातानुकूलित कमरों में बैठकर होता है, लेकिन जब नेतृत्व की कमान एक ऐसे व्यक्तित्व के हाथ में हो जिसने जमीनी हकीकत को करीब से जिया हो, तो नीतियां कागजों से उतरकर सीधे खेतों तक पहुँचती हैं।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव स्वयं एक जमीनी व्यक्तित्व वाले नेता हैं। आम आदमी और किसानों के साथ उनका जुड़ाव कोई राजनीतिक शिष्टाचार नहीं, बल्कि उनके बचपन के अनुभवों की गहराई है। यही कारण है कि आज प्रदेश का किसान उन्हें केवल एक मुख्यमंत्री के रूप में नहीं, बल्कि अपने बीच के एक ऐसे साथी के रूप में देखता है जो उनके पसीने की कीमत और उनके संघर्ष की अहमियत समझता है। उनकी यह 'किसान हितैषी' सोच अब एक बड़े अभियान 'कृषि कल्याण वर्ष 2026' के रूप में जमीन पर उतरने जा रही है।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का मानना है कि किसान की फसल तब तक कीमती नहीं होती, जब तक वह सही समय पर सही बाजार तक न पहुँच जाए। इसी विजन को साकार करने के लिए उज्जैन, इंदौर और मालवा-निमाड़ सहित पूरे प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में सड़कों का जाल बिछाया जा रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों को शहरी केंद्रों से और गांवों को सीधे नेशनल हाईवेज से जोड़ने वाले मार्ग बनाए जा रहे हैं। ये महज निर्माण कार्य नहीं हैं, बल्कि ये वे 'आर्थिक गलियारे' हैं जो किसानों की फसलों को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर के बाजारों तक पहुँचाने के लिए तैयार किए जा रहे हैं।
जब खेत से सीधे हाईवे तक का रास्ता सुगम होगा, तो परिवहन की लागत घटेगी और किसान की उपज का मूल्य बढ़ेगा। यह मुख्यमंत्री के उसी जमीनी अनुभव का परिणाम है, जिसके तहत वे जानते हैं कि बुनियादी ढांचा ही कृषि विकास का असली पूरक है। अटल प्रोग्रेस-वे और टाइगर कॉरिडोर जैसे प्रोजेक्ट्स इस विजन को और मजबूती प्रदान कर रहे हैं।
आज, यानी 11 जनवरी को राजधानी भोपाल के जंबूरी मैदान से जब 1101 ट्रैक्टरों की रैली निकलेगी, तो वह केवल एक शक्ति प्रदर्शन नहीं होगा, बल्कि मध्यप्रदेश के बदलते कृषि परिदृश्य का जयघोष होगा। डॉ. मोहन यादव इस अवसर पर 'कृषि कल्याण वर्ष 2026' की औपचारिक शुरुआत करेंगे। सरकार ने इसे केवल एक साल का उत्सव नहीं माना है, बल्कि तीन साल का एक ठोस रोडमैप तैयार किया है, जिसमें खेती को तकनीक, आधुनिक मशीनरी और ग्लोबल मार्केट से जोड़ा जाएगा।
अक्सर चर्चा होती है कि किसानों की आय कैसे बढ़े? मुख्यमंत्री ने इसका एक व्यावहारिक जवाब खोजा है। उन्होंने कृषि, सहकारिता, पशुपालन, उद्यानिकी, खाद्य प्रसंस्करण, मत्स्य और ऊर्जा—इन सातों विभागों को एक साथ लाकर 'सिंगल विंडो' सिस्टम की तरह काम करने के निर्देश दिए हैं। उद्देश्य साफ है—किसान को सिंचाई के लिए बिजली, आधुनिक बीज, वैज्ञानिक सलाह और उसकी उपज की प्रोसेसिंग के लिए स्थानीय स्तर पर ही यूनिट्स मिलें। जब आलू से चिप्स और टमाटर से केचप बनाने वाली इकाइयां गांवों के पास होंगी, तो बिचौलियों का अंत होगा और लाभ सीधे किसान की जेब में जाएगा।
डॉ. मोहन यादव की सोच केवल स्थानीय नहीं, बल्कि वैश्विक है। वे चाहते हैं कि मध्यप्रदेश का किसान दुनिया के सबसे आधुनिक देशों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चले। इसी योजना के तहत, किसानों को इजराइल की 'ड्रिप इरिगेशन' (सूक्ष्म सिंचाई) और ब्राजील की 'उन्नत नस्ल सुधार' तकनीक को देखने और सीखने के लिए विदेश भेजा जाएगा। एक्सपोजर विजिट के जरिए जब किसान दुनिया की सर्वोत्तम पद्धतियों को अपनी आंखों से देखेंगे, तो वे अपने खेतों में भी उसी स्तर का नवाचार करेंगे। यह कदम मध्यप्रदेश को कृषि क्षेत्र में 'डिजिटल और ग्लोबल हब' बनाने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा।
खेती की बढ़ती लागत आज सबसे बड़ी चिंता है। मुख्यमंत्री ने इसके लिए 'एग्री स्टेक' और डिजिटल कृषि को बढ़ावा देने का संकल्प लिया है। ड्रोन के माध्यम से दवाओं का छिड़काव हो या माइक्रो इरिगेशन के जरिए पानी की एक-एक बूंद का हिसाब—सरकार तकनीक के जरिए खेती को आसान और सस्ता बनाने में जुटी है। जब मशीनरी सस्ती होगी और तकनीक सुलभ, तो किसान की मेहनत का फल उसे पूरा मिलेगी।
आगामी समय में मध्यप्रदेश के लिए राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर कई चुनौतियां खड़ी हैं। किसी भी 'कल्याण वर्ष' की असली सफलता इस बात पर टिकी होती है कि वह वोट बैंक के बजाय वास्तविक विकास में कितना बदलता है।
सरकारी योजनाओं का लाभ अक्सर कागजों तक सिमट जाता है। मुख्यमंत्री के सामने सबसे बड़ी चुनौती प्रशासनिक मशीनरी को सक्रिय रखने की है, ताकि सात विभागों का समन्वय केवल फाइलों में न दिखे। उर्वरक वितरण और समय पर मुआवजा (आरबीसी 6-4) जैसे मुद्दों पर विपक्षी दल अक्सर घेराबंदी करते हैं, ऐसे में पारदर्शिता बनाए रखना सरकार के लिए अनिवार्य होगा।
समर्थन मूल्य (MSP) और भुगतान में देरी जैसे संवेदनशील मुद्दे चुनावी मौसम में सरकार के लिए सिरदर्द बन सकते हैं। इंदौर में कांग्रेस की 'न्याय यात्रा' इसी असंतोष को भुनाने की कोशिश है। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि 'मुख्यमंत्री किसान कल्याण योजना' की किस्तें समय पर पहुंचे और मंडियों में बिचौलियों का रसूख खत्म हो।
यदि 'कृषि कल्याण वर्ष' के माध्यम से रोजगार के अवसर और फूड प्रोसेसिंग यूनिट्स वास्तव में धरातल पर आती हैं, तो यह ग्रामीण युवाओं के बीच भाजपा की पकड़ को और मजबूत करेगा। इजराइल-ब्राजील यात्रा जैसे नवाचार किसानों में एक नया आत्मविश्वास भर सकते हैं। कनेक्टिविटी का सुधार न केवल कृषि बल्कि पर्यटन और व्यापार को भी गति देगा, जो कि चुनावी साल में एक बड़ा 'पॉजिटिव माइलेज' साबित हो सकता है।
'कृषि कल्याण वर्ष 2026' की शुरुआत उस विश्वास की नींव पर रखी गई है, जो डॉ. मोहन यादव ने अपनी जमीनी कार्यशैली से किसानों के बीच अर्जित किया है। सड़कों के माध्यम से खेतों को हाईवेज से जोड़ना और किसानों को वैश्विक बाजार प्रदान करना, यह दर्शाता है कि मुख्यमंत्री केवल आज की नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की खेती को सुरक्षित और समृद्ध बनाना चाहते हैं। यदि यह मिशन अपनी तय गति से आगे बढ़ा, तो मध्यप्रदेश न केवल देश का 'अन्न भंडार' बना रहेगा, बल्कि कृषि निर्यात के मामले में भी अग्रणी राज्य बनकर उभरेगा। आज का दिन मध्यप्रदेश के इतिहास में एक नया अध्याय लिखेगा, जहाँ 'ग्रामोदय' से 'कृषि-कल्याण' की यात्रा एक नए संकल्प के साथ शुरू होगी।

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