Sunday, July 8, 2012

कमीशन के भूखे ‘भगवान’

prakash amte aur mandaki amte. hamare doctor inse kuch to sekh sakte hai.

राम-रावण का युद्ध चल रहा था। रावण का बेटा मेघनाद और लक्ष्मण जी भिड़ गए। लक्ष्मण जी से हारने की कगार पर पहुंचे मेघनाद ने शक्तिबाण चला दिया। लक्ष्मण जी मूर्छित हो गए। अब ऐसा डॉक्टर की तलाश शुरू हुई जो लक्ष्मण जी का इलाज कर सके। अब डॉक्टर भी मिले तो दुश्मन रावण के मुल्क के। सुषेण नामक वैद्य जी हां। वैद्य ने दोस्ती देखी न दुश्मनी और लक्ष्मण जी का इलाज किया।
ऐसे होते थे वैद्य डॉक्टर
अब बाबा आम्टे की बात करते हैं। दुनिया भर में प्रसिद्धि बटोरने वाले सच्चे जनसेवक थे बाबा आम्टे। बचपन में चांदी के पलंगों में सोने वाले बाबा ने जवानी समाजसेवा को समर्पित कर दिया। उनके बेटे और बहू जो कि पेशे से डॉक्टर हैं वे भी पैसे नहीं समाजसेवा कमा रहे हैं। प्रकाश और बहू मंदाकिनी आम्टे महाराष्ट्र में कुष्ठ रोगियों के लिए सेवा में समर्पित हैं....
आप सोच रहे होंगे कि मैं इनकी बात क्यों कर रहा हूं। आपके सवालों का जवाब नीचे है
आजकल अधिकतर डॉक्टर बेईमान हो गए हैं। दवा कंपनियों से पैसे और गिफ्ट लेने की बातें तो पहले भी सुनी थीं। मैंने तो यहां तक सुना था कि कई कंपनियां डॉक्टरों को फ्लैट भी गिफ्ट करती हैं। पर रविवार को पढ़ी खबर से सन्न रह गया। एक दवा कंपनी ने लाखों रुपए खर्च कर डॉक्टरों को विदेश की सौर करवा दी। मात्र टिकट ही 12 लाख रुपए का था। सोचिए पूरी यात्रा में कितने रुपए खर्च हुए होंगे।
इन डॉक्टरों से इलाज कराने वाले कई मरीज ऐसे होते हैं, जो जिंदगी भर मेहनत से रुपए कमाते हैं और एकसाथ 12 हजार रुपए भी नहीं देख पाते। जब बीमार पड़ते हैं तो डॉक्टर कमीशन के चक्कर में महंगी दवाएं लिखते हैं, गरीबों को जिंदगी बचाने के लिए दवाएं खरीदनी पड़ती हैं। डॉक्टर चाहें तो सस्ती दवाएं भी लिख सकते हैं। पर ऐसे में विदेश घूमने को कहां मिलेगा।
एक डॉक्टर ईमानदारी से भी काम करे तो वह इतना  कमा सकता है कि उसका जीवन बेहतर कट सकता है। फिर कई डॉक्टर लोगों से खिलवाड़ क्यों कर रहे हैं। पैसों के लोभ में इतनी महंगी दवाएं क्यों लिख देते हैं कि बिल देखकर ही लोग मर जाएं। आखिर विदेश सैर या गिफ्ट की भूख से भगवान बेइमान क्यों बन रहा है।
मैं ऐसे दर्जनों डॉक्टरों को जानता हूं, जो हफ्ते में एक दिन नि: शुल्क परामर्श देते हैं और हो सके तो उन्हें दवाएं भी उपलब्ध कराते हैं। ऐसे समाजिक सेवा करने वाले डॉक्टर भी तो पैसों के लोभी हो सकते हैं पर अभी तक वे बचे हुए हैं। शायद वे सच्चाई जानते हैं। जो भी हो भगवान कहे जाने वाले डॉक्टरों को कुछ तो शर्म करनी चाहिए। ज्यादा से ज्यादा यह होगा कि उन्हें विदेश यात्रा नहीं मिलेगी। उन्हें गिफ्ट नहीं मिलेंगे, लेकिन हां सबसे बड़ी चीज मिलेगी। मरीजों की दुआ।

Sunday, April 22, 2012

ऐसे, कैसे चलेगा काम?

IAS Manan

mla manghi

r vinel krihna IAS
  दो राज्य, दो कलेक्टर, दोनों आईएएस (प्रमोटी नहीं) दोनों बेहद पढ़े-लिखे, दोनों में समाज सेवा का जज्बा और जोश, दोनों में देश के बदलाव की चाहत, दोनों को चाहने वालों की लंबी लाइनें, दोनों इमानदार, दोनों पड़ोसी राज्यों में नियुक्त हैं (आर. वीनिल कृष्णा-ओडीशा, एलेक्स पॉल मेनन-छत्तीसगढ़), दोनों लोगों की समस्या जानने, लोगों को जागरूक करने भयानक जंगलों में घुसते हैं, दोनों सरकारी तामझाम से दूर। सिर्फ कुछ गार्डों के साथ, दोनों को सिर्फ काम से मतलब, नक्सलियों के इलाके में नक्सलियों के खिलाफत, जनता को विकास से जोड़ने की जोशीली बातें। बस यही कारण उनके लिए मुसीबत बन जाता है। पर ऐसे अधिकारियों के जज्बे को सलाम। क्योंकि वे उन नेताओं से बेहतर हैं जो गार्डों के घेरे और हेलीकॉप्टर के बिना कहीं नहीं जाते।
अब 16 फरवरी 2011 की शाम को याद कीजिए, उड़ीसा के मलकानगिरी कलेक्टर आर. वीनिल कृष्णा का अपहरण कर लिया गया वे एक ग्राम विकास कार्यक्रम में पहुंचे और इंजीनियर द्वारा बनाए गए पुल की जांच खुद पहुंच गए। पुल तक पहुंचे ही थे, घात लगाए नक्सलियों ने उन्हें पकड़ लिया। 7 दिन बाद मांगें मनवाने पर ही नक्सलियों ने कृष्णा को रिहा किया। करीब 14 महीने गुजरे राज्य बदल गया, 21 अप्रैल 2012, को छत्तीसगढ़ के नए जिले सुकमा कलेक्टर आईएएस एलेक्स पॉल मेनन का अपहरण। मेनन भी ग्राम सुराज अभियान में शामिल होने माझीपारा गांव पहुंचे थे। सीईओ से कलेक्टर बने 2006 बैच के भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी को शायद पेचीदगियों का अनुमान नहीं था कि सच्चाई सुनने के आदी भारत में कम ही मिलते हैं। खासकर जब नेताओं ने गरीबों को कुचला है, उनके अधिकारों का अतिक्रमण किया है। मेनन लोगों को जीने के तरीके बता रहे थे, वहीं आम आदमी बनकर आए नक्सलियों को उनकी बातें चुभने लगीं और कलेक्टर को घेर लिया।

हमारे इमानदार कर्मचारी
इमानदारी और कलेक्टर की लोकप्रियता देखिए, सिर्फ दो गार्ड 20 से ज्यादा नक्सलियों से भिड़ गए और अपने अधिकारी को बचाने के लिए शहीद हो गए। नक्सलियों का काला चेहरा इसी से बेनकाब होता है। हो सकता है कि आम नागरिकों से नक्सली बने इन आतंकियों के साथ कुछ गलत हुआ हो। पर इसका मतलब कतई नहीं कि आम पुलिस वालों की हत्या कर दी जाए, जरा सोचिए अपने परिवार से दूर इन जवानों के बारे में जो दिन-रात जंगल में रहते हैं। लोगों की सेवा करते हैं। नक्सलियों को देखने पर उन्हें चुनौती देते हैं, अचानक गोली नहीं चलाते। इसी के उलट नक्सलवादी अचानक हमले कर उनकी हत्या कर देते हैं। सोचिए इन गार्डों के परिवारों पर क्या गुजरती होगी। 10 से 12 हजार रुपए कमाने वाले सपूतों को खो देते हैं। जंगल पर नक्सलियों का राज कायम है। सरकार सिर्फ एयर कंडीशनर कमरों में बैठकर मीटिंग लेती है और आदेश देती है कि नक्सलियों से सख्ती से निपटा जाए। जान गंवाते हैं हमारे आम जवान और ऐसे लोग या ग्राम प्रधान जो पुलिस का सहयोग करते हैं। नक्सली उन लोगों को जिंदा जला देते हैं, जिनपर उन्हें शक होता है कि यह हमारी खबर सरकार तक पहुंचा रहे हैं। ऐसे में छत्तीसगढ़ में चल रहे ग्राम सुराज क्या गुल खिलाएगा। जब अभियान में जाने वाले अधिकारी तक सुरक्षित नहीं होते, मुंह खोलने वाले लोगों को जान गंवानी पड़ती है तो फिर गांव वाले कैसे नक्सलियों के विरोधी बन सकते हैं।

रील लाइफ से रियल में आते हैं
शोले तो सभी ने देखी होगी। गब्बर के इलाके में जब एक इमानदार पुलिसवाला आता है तो उसके हाथ काट दिए जाते हैं। दो अपराधी जब लोगों को जागरूक करने आते हैं तो कई ग्रामीणों की जान डाकु ले लेते हैं। शहर पढ़ने जाने वाले युवक की हत्या कर देत हैं। ऐसे में रील लाइफ तो हीरो को हीरो बना देती है।
पर देखिए छत्तीगढ़ के जंगलों में रहने वाले लोग क्यों जान गवाएंगे। जहां सरकार नहीं पहुंचती, योजनाओं का लाभ नहीं मिलता, ऐसी जगहों पर नक्सली विराजमान हैं। अब जनता की सरकार तो नक्सली ही हुए न। रियल लाइफ में डाकू गब्बर को मारना आसान नहीं है।

अपहरण पर अपहरण, उदासीन सरकार, आतंकियों के बुलंद हौसले
ओडीशा में दो इतालवी पर्यटकों का अपहरण हो या फिर 24 मार्च को हुए सत्तारूढ़ पार्टी बीजू जनता दल (बीजद) के विधायक झिना हिकाका (34 साल) का अपहरण, सभी मामले में सरकार सिर्फ मिटिंग लेती है। नक्सली हर बार अपनी मांगें मनवा लेते हैं। पर अब चिंता पहले से कहीं गंभीर हैं।
-विधायक
-दो कलेक्टर
इन चिंताओं पर बयानबाजी की बारिशें होती हैं। बस निष्कर्ष कुछ नहीं निकलता।

5000 किमी तो वार कर लेंगे, देश का क्या
देश के 28 स्वतंत्र राज्यों में छत्तीसगढ़, कर्नाटक, ओडीशा, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, झारखंड, पश्चिम बंगाल और बिहार-उत्तर प्रदेश में आंशिक रूप से नक्सली व्याप्त हैं। ऐसे में क्या कहा जाए। देश आजाद होने के 60 साल से ज्यादा बीत गए। अग्नि-5 विदेशों में चमक रही है। 5 हजार किमी तक मार करने वाली मिसाइल से हम दुनियाभर से बच सकते हैं। वहां हमले कर सकते हैं, लेकिन देश के अंदर ऐसा क्या हो गया कि मुठ्ठी भर नक्सलियों को निशाना नहीं बना पाए।

विदेशों से सीखें
अमेरिका घर बैठे-बैठे इस्लामाबाद में दुनिया के सबसे बड़े आतंकी लादेन को मार गिराता है। लीबिया की जनता तानाशाह शासक गद्दाफी को पुल के अंदर से   निकालकर मौत देती है। ऐसे में हमारे देश की सरकार की ऐसी क्या मजबूरी है कि नक्सलियों पर नियंत्रण नहीं रख पा रही है।

कैसे कसी कमर
16 अप्रैल, जगह नई दिल्ली, मुद्दा नक्सलवादी। सभी नक्सल प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्री, देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, गृह मंत्री पी चिदंबरम। इन सभी ने मीटिंग की। कहा- नक्सलियों पर लगाम लगाकर रहेंगे। 5 दिन नहीं बीते और कलेक्टर का अपहरण, दो गार्डों की हत्या। अब बताइए, कैसे कमर कस रही है सरकार। ऐसी कई बैठकें पहले भी हो चुकी हैं पर समस्या जस की तस बनी है। सरकार के नाम एक भी बड़ी उपलब्धि नहीं हैं। हां सिर्फ कुछ नाकामियां जरूर मिली हैं। 

दूसरे अधिकारी क्या करेंगे
छत्तीसगढ़ ने हाल ही में 9 नए जिलों का गठन किया है। सभी जगह नए कलेक्टर व अन्य अधिकारी तैनात किए हैं। अब जब कलेक्टर का अपहरण हो रहा है तो अन्य जिलों के अधिकारी क्यों नक्सलियों को चुनौती देंगे। भला मुसीबत क्यों लेगें। क्या इसका जवाब है सरकार के पास। जंगली इलाकों के बीच के ये जिले, जहां सरकारी मदद के पहले नक्सली पहुंच जाते हैं। वहां की सड़कों पर नक्सलियों का कब्जा है। सड़क बनाने वाले ठेकेदार लेवी (एक प्रकार की रिश्वत)  देते हैं, तब वहां काम करते हैं। ऐसे में सरकार का अगला कदम क्या होगा? यह एक बड़ा सवाल है। सरकार को इमानदारी से सेना के माध्यम से एक बड़े अभियान चलाने की जरूरत है, हां और राज्यों को भी केंद्र की मदद करनी होगी। राज्य और केंद्र का समन्वित कार्य ही इस लाल आतंक को समाप्त कर सकता है।

Saturday, January 7, 2012

सावधान

बात 1997 की है। जब मैं चौथी कक्षा में पढ़ता था, गांव का सरकारी स्कूल। शिक्षकों की कमी का दौर था। मेरे गांव के पड़ोसी गांव में तो एक शिक्षक ही था, इसीलिए दोनों गांवों के बच्चे एक साथ पढ़ते थे। हमारे गांव के स्कूल में कक्षाएं एक साथ लगती थीं। एक मासाब थे मिश्रा सर, बड़े ही सख्त, शराब के आदी। एक दिन मैं स्कूल की खिड़की पार कर निकल गया, तब सर को पता चला तो, आव देखा न ताव उलटी हथेली गाल पर रख दी। उनकी सोने की अंगूठी मेरे गाल पर छप गई, जैसे किसी ने सील लगा दी। बस अपन रोते-रोते घर पहुंच गए। मेरी बऊ (दादी) ने ऐसा देखा तो गुस्से से लाल हो गई और पहुंच गर्इं स्कूल। मिश्रा जी को खूब डांट पड़ी। इसके बाद जब मां को जानकारी लगी तो उन्होंने बऊ को समझाया और मुझे धमकाया। कहा, दो बार ऐसी गलती की तो मैं भी मारूंगी।
उस समय शिक्षा का अधिकार कानून लागू नहीं हुआ था। शिक्षक रूल से पिटाई करते थे। बेशरम (एक प्रकार का पौधा)  की छड़ी से पिटाई होती थी। सजा पर रोक नहीं थी। आप सोच रहे होंगे ये आत्मकथा मैं आपको क्यों सुना रहा हूं।
दरअसल भोपाल के एक स्कूल की घटना ने मुझे यह लिखने पर मजबूर कर दिया। लाइब्रेरी में बैठे छात्र जब हू-हल्ला मचा रहे थे तो एक शिक्षक ने उन्हें सजा दे दी। वो भी 500 बार यह लिखवाया कि हम दोबारा अनुशासन नहीं तोड़ेंगे। बेशक बच्चे बहुत छोटे थे। पर माता-पिता को यह मामला बड़ा लगा, अखबार में खबरें छपीं। बाल अधिकार संरक्षण आयोग स्कूल पहुंच गया। आखिर इतनी जरूरत क्या थी। बच्चों को दी गई सजा मामूली थी। शारीरिक भी नहीं। ऐसे में माता-पिता इतने उत्तेजित कैसे हो सकते हैं। क्या बच्चों को सिर में नहीं चढ़ा रहे हैं।
पिछले साल की घटना को ले लें राजधानी के एक प्रतिष्ठित स्कूल जिसका रिजल्ट अब खराब हो गया है, में पढ़ने वाले छात्रों को स्कूल ने टीसी दे दी थी, कारण था वे पढ़ाई के प्रति लापरवाह और अनुशासन को तोड़ने में हमेशा आगे रहते थे। कई बार चेतावनी के बाद भी वे नहीं सुधरे तो स्कूल ने बाहर कर दिया। विवाद कलेक्टर तक पहुंच गया। शिक्षा के अधिकार कानून का भला हो। स्कूल की नहीं चली और बच्चे फिर स्कूल में पहुंच गए। रिजल्ट आया तो मेरिट में कोई भी छात्र नहीं था, एक ऐसे स्कूल से जिसने कई आईएएस दिए हैं।
बच्चों की हरकतों पर नजर न रखने के कारण बच्चों में कई समस्याएं आ रही हैं। ऐसे में बच्चों को अच्छे संस्कार देने का समय आ गया है, नहीं तो इस उम्र में बच्चे क्या सीखेंगे उसके दूरगामी परिणाम दुख भरे हो सकते हैं।
गाजियाबाद के एक स्कूल की घटना है, न्यू ईयर में 10वीं के छात्र-छात्राएं शराब पीते पकड़े गए। ये बच्चे घर से पार्टी मनाने की बात कहकर निकले थे। माता-पिता को क्या पता कि वे क्या कर रहे हैं। ये बच्चे 12-15 साल की उम्र के थे।
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शोध का सच
एक शोध में वैज्ञानिकों ने पाया है कि बच्चे जल्द युवा बनने की चाहत रखते हैं। पर्यावण के बदलने के साथ-साथ बच्चों में सेक्चुअल हार्मोन भी जल्द विकसित हो रहे हैं। बच्चे ब्यॉवफ्रेंड, गर्लफ्रेंड की बातें करते हैं। प्यार के बारे में कुछ पता नहीं, लेकिन पटरी पर कट जाते हैं।  स्कूलों में मस्ती के स्तर को भी पार कर जाते हैं। स्कूलों में मोबाइल फोन ले जाते हैं, ऐसे वैसे नहीं ब्लैकबेरी। एक छात्र जब दूसरे को यह दिखाता है तो उनके अंदर प्रतिस्पर्धा की भावना आती है। पढ़ाई दूर की बात यू-ट्यूब पर वीडियो देखते हैं। अश्लील फिल्में भी देखते हैं। एक कमरे में कैद बच्चे क्या कर रहे हैं। कामकाजी माता-पिता को इसकी जानकारी ही नहीं रहती। ऐसे में बच्चों को इतना सिर में चढ़ाना गलत है। बच्चों के बारे में हमेशा जानकारी लेना पालकों का कर्तव्य होना चाहिए।

Wednesday, November 30, 2011

कन्या की आवश्यकता, सरकारी नौकरी

  राजपूत, क्षत्रिय, कलार, 30 वर्ष, 5 फीट 8 इंच, सरकारी नौकरी, 20 हजार रुपए मासिक वेतन, एमबीए, पीएचडी युवक हेतु सुंदर कन्या की आवश्यकता है। 
 
जी हां
यह एक विज्ञापन है। ऐसा विज्ञापन मैं कई लोगों के लिए बनाता हूं, क्योंकि लोगों को लगता है पत्रकार है अच्छा बनाएगा। अकसर ऐसे विज्ञापन रविवार को ही छपते हैं।
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रविवार सुबह 6 बजे
अचानक फोन घनघनाने लगे
लड़की वाले: जी....... हम बैतूल से बोल रहे हैं......... हां जी वो पेपर में पढ़ा था आपका बेटा कौन सी नौकरी करता है
लड़के के पिता: जी हां सरकारी नौकरी में हैं हमारा लड़का
लड़की वाले: अच्छा साब कितनी तन्खा है।
लड़के वाले : 20 हजार रुपए महीने (15 है तो 5 बढ़ा दिए, ऐसा भी होता है)
लड़की वाले: सर, उपरी कमाई भी होगी कुछ
लड़के वाले: जी हां वो तो हर सरकारी नौकरी वाले की होती है
दोनों हंसते हैं.......
लड़के वाले: आपकी बेटी कहां तक पढ़ी है
लड़की वाले: जी एमटेक है, बैंक की नौकरी की तैयारी कर रही है
लड़के वाले: बढ़िया, हम तो सुंदर बहू ढृूंढ रहे हैं, देखिए भाग्य में जो लिखा है वही होगा।
लड़की वाले: हमें तो कैसा भी लड़का चलेगा बस सरकारी नौकरी में हो।
लड़के वाले : हां साब आज कल सरकारी नौकरी कहां मिलती है। टार्च लेकर ढूंढने पर भी नहीं मिलते।  हमारे यहां तो रिश्तों की लाइन लगी है पर सोच रहे हैं, शादी एक बार करनी है अच्छे (थोड़े घमंड से) से ही करेंगे।
लड़की वाले: साहब हम तो शादी जैसी कहेंगे वैसी ही कर देंगे।
(न नाम पूछे न पता, शादी तक बात पहुंच गई, देखिए विडंबना। बात बढ़ती जा रही है अब देखते हैं आगे क्या होता है)
लड़के वाले: साहब वो फोटू भेज देते तो लड़की देख लेते हम।
लड़की वाले: पता लिखवा देना जी, अरी ओ सोनू की मम्मी पेन डायरी देना , अरे साब जरा रुकिए हां। अब बोलें पता .........
लड़के वाले : जी ठीक है हम बताते हैं
(फोन कटा नई कि दूसरा वेटिंग में आ जाता  है)
हलो जी कहां से बोल रहे हैं........
लड़के वाले: हम तो भोपाल से चतुर्वेदी बोल रहे हैं आप कौन
लड़की वाले: जी वो लड़के-लड़की के बारे में बात करनी है।
लड़के वाले: जी जी ........
सुबह से इतने फोन आ रहे हैं कि क्या बताएं
आपकी बेटी कैसी दिखती है
लड़की वाले: साब फेयर कलर है, खाना बनाना भी जानती है बीए कर रही है, लड़की है जितनी जल्दी हो तो ससुराल भेज दो। अच्छा है
लड़के वाले: हां साब
लड़की वाले: लड़का की तन्खा बताइए
लड़के वाले: साहब 20 हजार रुपए महीना है और उपरी कमाई भी है फारेस्ट में है न लड़का।
लड़की वाले: हां समझ गए एक सागौन बेंचा नई कि हजार रुपए मिल जाते हैं
हा हा.......हा दोनों हंसते हैं।
लड़के वाले: आप शादी कैसी करेंगे।
लड़की वाले: हम तो बड़े खेत-बाड़ी वाले हैं , बड़ी लड़की की दार हमनें इंडिका दिए थे, दामाद मास्टर थे। अब तो और अच्छी करेेंगे।
लड़के वाले: फिर भी बजट तो बताएं
लड़की वाले: अरे साब हमें तो सरकारी नौकरी वाला लड़का चाहिए। 15 लाख रुपए तो कम से कम खर्चा करेंगे ही।
लड़का वाले: जी ...जी...
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ऐसे ही कई फोन, लड़के वाले तो फूले नहीं समाए
500 रुपए के विज्ञापन के कारण मप्र छत्तीसगढ़ के लाखों के आफर आ गए।
जी हां आजकल सरकारी नौकरी पढ़, सुनकर ही लोग बेटी के लिए रिश्ते तय कर देते हैं, लड़का की योग्यता की छोड़िए, जोड़ी से मतलब नहीं।
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क्यों पसंद आते हैं सरकारी नौकर
- लोगों को पता है उपरी कमाई होगी
- कंप्यूटर आॅपरेटर भी है तो 10 रुपए तो एक लेटर के ले ही लेगा
- मनरेगा में पंचायत सचिव है तो प्रमाण पत्र के 5-5 रुपए ले लेगा
- पोस्ट मास्टर है तो पेंशन निकलवाने आने वाले बुजुर्गों से 5 से 10 रुपए ले लेगा
-इंजीनियर है तो बिना पैसे बिल्डिंग की डिजाइन पास नहीं करेगा
-डॉक्टर है तो सरकारी अस्पताल में आने वाले मरीज को कहेगा, प्राइवेट में आना
-रेलवे में टिकट कलेक्टर है तो, बिना टिकट वालों को 50 रुपए में सीट दे देगा
-रेलवे में गार्ड है तो खुद जमीन में सो जाएगा, 200 रुपए में खुदकी सीट दे देगा
- अगर संविदा मास्टर भी है तो सरकारी स्कूलों में बच्चों से मार्कशीट के 5-5 रुपए ले लेगा
बाकी बड़ी नौकरियों को छोड़िए साहब इतना भ्रष्टाचारी दामाद के लिए तो कोई भी अपनी फूल सी बेटी सरकारी नौकर को दे ही देगा, भले ही बेटी पांच फीट की हो और दामाद 6.9 का।
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शहर में रहेगी बेटी
आजकल मां-बापों की सोच बन गई है कि हमारी बेटी ससुराल से दूर ही रहे। अगर शहर में लड़का नौकरी कर रहा है तो बेटी हमेशा शहर में रहेगी। सास-ससुर तो बोझ बन जाते हैं। मां-बाप इस बात को भूल जाते हैं कि हमारे भी बेटे हैं।
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प्राइवेट वाले और किसानों का क्या

अगर कोई बड़ी सॉफ्टवेयर या अन्य कंपनी में काम करता है तो उसको तो लड़की मिल ही जाएगी। लेकिन अगर लड़का कम तन्खा वाली प्राइवेट नौकरी कर रहा तो तो शादी तो भूल ही जाए। मार्केट में उसकी कम वैल्यू है। अगर लखपति किसान भी है और वो वैज्ञानिक पद्धति से खेती कर 50 हजार रुपए महीने कमाता है तो, 10 हजार रुपए वाले सरकारी नौकर से पीछे है। सरकारी तो सरकारी है।
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नोट: उपर लिखा गया लेख पूर्णत: व्यवहारिक है। लेखक ने इसे देखा और समझा है, लेकिन किसी की वास्तविक   जिंदगी से इसका कोई सरोकार नहीं है।

Sunday, August 21, 2011

दो ड्राइवरों ने ले ली 10 यात्रियों की जान

  ड्राइवरों नें कुछ इस तरह जलाइं एक दूसरे की बसें




कई यात्री गंभीर रूप से झुलसे
मृतकों में महिलाएं और बच्चे भी शामिल
बस में 40 लोग सवार थे
 बाद वाली बस को पेट्रोल डालकर जलाया गया
सवारी ढोने को लेकर हुआ विवाद
आग लगाते समय यात्रियों को बस में बंद कर दिया गया था
घटना के मजिस्ट्रीयल जांच के आदेश
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  इस वीभत्स घटना में आरोपियों को फांसी मिले भी तो कम है, आखिर बेकसूरों की जान वापस कैसे आएगी। हां हमारे मुख्यमंत्री ने मृतकों के परिजनों को एक-एक लाख रुपए सहायता देने की बात कही है। 
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बड़वानी जिले के बालसमुद के पास रविवार को दो बस चालकों में हुए विवाद के बाद दोनों बसों में आग लगा दी गई, जिसके चलते 10 निर्दोष यात्रियों की जिंदा जलकर मौत हो गई और कम से कम 10 अन्य व्यक्ति बुरी तरह झुलस गए। मृतकों में महिलाएं और बच्चे भी शामिल हैं।अपुष्ट सूत्रों के अनुसार मृतक संख्या काफी ज्यादा हो सकती है। बताया जाता है कि जिस बस को बाद में आग लगाई गई उसमें 40 लोग सवार थे। इस बस को पेट्रोल छिड़ककर आग लगाई गई। घटना के मजिस्ट्रीयल जांच के आदेश दिए गए है।
राजमार्ग क्रं. 3 पर रविवार दोपहर को सेंधवा से इंदौर जा रही निजी यात्री बस (सांईकृपा बस  क्रं. एमपी-09-एफए-2717) तथा आरजे-09-पीए-1442 अशोक ट्रेवल्स के परिचालकों में सवारी ढोने को लेकर हुए विवाद हुआ। ग्राम जामली स्थित टोल प्लाजा पर कहा सुनी हुई। विवाद में अशोक ट्रेवल्स के कर्मचारी ने टोल प्लाजा से लगभग 5 किमी दूर स्थित बालसमुद परिवहन चौकी के समीप पीछे से आ रही सांईकृपा ट्रेवल्स  बस को रोककर  मुख्य द्वार पर पेट्रोल डालकर आग लगा दी। बताया जाता है कि यह बस मां शारदा टेवल्स से अटैच है, विवाद में हुई आगजनी की घटना से घबराए कुछ यात्री बस से उतर कर भागने में कामयाब रहे, वहीं अन्य कई लोग बुरी तरह से झुलस गए। प्रत्यक्षदर्शियों राजेश मुजाल्दे के अनुसार लगभग 4.30 बजे अशोका ट्रेवल्स से उतरे एक कर्मचारी ने सांईकृपा टेवल्स की बस को रोका और उसमें आग लगाई। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के चलते घटना के समय बस में लगभग 40 से अधिक यात्री सवार थे। प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि आग इतनी भयानक थी कि उसके समीप जाकर यात्रियों को बचाने की कोशिश भी नहीं कर पाए। अफरा-तफरी के माहौल में बस में कितने यात्री उतर पाए और कितने यात्रियों की जीवनलीला जल कर समाप्त हो गई, इसका उस समय अंदाजा तक नहीं लगाया जा सका। 


गुस्साई भीड़ ने लगाई आग
अचानक हुई इस घटना से परिवहन चौकी तथा ग्राम सालीकला के ग्रामीणजन एकत्रित हो गए। घटना की सच्चाई से अवगत होने पर गुस्साई भीड़ ने दूसरी बस आरजे-09-पीए-1442  में भी आग लगा दी। जिसमें कोइ भी हताहत नहीं हुआ।
बड़वानी एसपी आरएस मीण ने बताया कि आपसी विवाद में बस चालक और परिचालक ने पेट्रोल डालकर दूसरी बस को आग लगाई है, जिसमें 10 लोगों की मौत हो चुकी है। फरार दोषियों की खोजबीन आरंभ कर दी गई है। मंदसौर स्थित बस मालिक से इस संबंध में पूछताछ की जा रही है।

एक ही परिवार के चार जले
इस घटना एक ही परिवार के चार सदस्यों के जल जाने की समाचार प्राप्त हुए है। बताया जा रहा है कि राजेन्द्र पिता बाबूराव खोरी निवासी धार अपने पिता बाबूराव खोरी (62), माता सुमन (55), पत्नि मनीषा (28), पुत्री साक्षी (3) तथा पुत्र अमन 6 माह के साथ सेंधवा में अपने छोटे भाई की ससुराल अरूण मेवाड़े के घर रविवार दोपहर 1 बजे के लगभग पहुंचे थे। जो सांईकृपा बस से वापस लौट कर धार जा रहे थे। घटना के बारे में राजेन्द्र ने बताया कि आगजनी के पश्चात उन्होंने अपने 6 माह के पुत्र को खिड़की से फेंक कर स्वयं भी कूद गए, लेकिन अपने माता-पिता, पत्नि तथा पुत्री को बचाने का प्रयास भी किया, लेकिन आग का शोला बन चुकी बस में वह दूसरी मर्तबा घुस नहीं पाया। जिससे उनके पूरे परिवार की मौत हो गई। शासकीय अस्पताल में पहुंचे नर कंकालों में 8 कंकाल उम्र दराज तथा दो कंकाल बच्चों के बताया गए हैं। घटना में अस्पताल में पहुंचे कंकालों में एक कंकाल की स्थिति दिल दहलाने वाली थी। 

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प्रारंभिक जानकारी नें पता चला हैं कि जलाई गई बस शारदा ट्रेवल्स इंदौर की है। वही दूसरी बस रिषीराज ट्रेवल्स की बताई जा रही हैं। इन दोनों बसो के मालिकों में पहले से विवाद चल रहा हैं। घटना के एक घंटे पहले भी विवाद हुआ था। इसके बाद घटना को अंजाम दिया गया हैं। इस मामाले में आरजे 09 पीए 1442 के चालक तरूण सोनी, कंडक्टर दिलीप शर्मा दोनो निवासी मंदसौर और एक अन्य कंडक्टर राजकुमार निवासी गुना के खिलाफ हत्या और आगजनी का मामला दर्ज कर लिया गया हैं। फिलहाल आरोपियों की तलाश की जा रही हैं।
अनुराधा शंकर,  आईजी इंदौर रेंज 

Saturday, August 6, 2011

ये कैसी स्वतंत्रता

  आजादी के 64 साल बीत गए हैं। भारत की जनता ने खोया ज्यादा है, पाया कम। हां लेकिन यह सच है कि खोने-पाने के इस गणित में कई लोग ऐसे हैं, जिन्होंने बहुत कुछ पा लिया। उनमें से एक हैं हमारे देश के नेता और अफसर। इन दोनों की जुगलबंदी का ही नतीजा है कि अब जिसके घर भी छापा पड़ता है करोड़पति निकलता है। भले ही भारत में लाखों लोग दो वक्त की रोटी को तरसते हों, पर ये नेता-अफसरों को कोई चिंता नहीं। उन्हें तो रहने को बंगला, खाने में 56 भोग हर दिन मिलता है। अब देखिए हम में से भी 90 फीसदी लोग ऐसे मिल जाएंगे जो गरीबी पर बात नहीं करना चाहते। गरीब, झुग्गीझोपड़ी वालों की तस्वीर दिखाना पसंद नहीं करते। हमें तो सिर्फ अपनों से मतलब हो गया है। अपनी नौकरी करो, वेतन पाओ, किसी से क्या करना है। ऐसी मानसिकता कहां ले जाएगी, जरा सोचिए। कुछ दिनों पहले की बात है इंदौर संभाग में पदस्थ एक इंजीनियर के घर छापा पड़ा तो उसके पास 5 करोड़ रुपए की दौलत मिली, बंगला 80 लाख से कम का नहीं, कार भी दो-दो। भोपाल में भी ऐसे आईएएस अधिकारी सामने आए जिन्होंने जिंदगी भर रिश्वत ली, बस और कुछ नहीं। पकड़े जाने के बाद भी उन्हें जेल नहीं हुई। बेबसी देखिए देश के विभिन्न जेलों में कैद कुल 70 फीसदी व्यक्ति विचाराधीन कैदी की श्रेणी में आते हैं। इनमें से कई ऐसे हैं, जिनपर मामूली अपराध दर्ज हैं या फिर बेकसूर हैं। पर क्या करें, कई दिनों से जेल में सड़ रहे हैं। ऐसा देश है मेरा। हमारे देश को जितना अंग्रेजों ने नहीं लूटा उतना हमारे नेता और अफसरों ने लूटा है। मैं विश्वास से कह सकता हूं कि  मप्र के सभी सरकारी इंजीनियर जो 90 से पूर्व में भर्ती हुए हैं, उनकी इमानदारी से तलाशी ली जाए तो 50 प्रतिशत से अधिक अनुपातहीन संपत्ति के मालिक हैं। ऐसे ही हैं आईएएस व अन्य अधिकारी। नेताओं की बात करना ही बेकार है, सांप के बिल में कौन हाथ डाल सकता है। साहब यह कोई बकवास नहीं है। हो सकता है कई लोगों को यह पढ़ने में बोझ लग रहा हो पर क्या करें। सच्चाई से रूबरू कराना तो काम ही है हमारा। अगर भारत को वाकई स्वतंत्र कराना है तो हमें लड़ना होगा उन नेताओं से जो भ्रष्टाचार के पितामह है, उन अफसरों से जो विभागों को अपने पिता की संपत्ति समझने की गलती कर बैठे हैं। याद दिला दूं 16 अगस्त से भ्रष्टाचार के विरोध में अन्ना हजारे भूख हड़ताल शुरू कर रहे हैं। सरकारी लोकपाल पास हो गया तो गलत हो जाएगा। इसलिए इतना दबाव बनाना होगा कि जनलोकपाल ही पास हो। इस 15 अगस्त पर प्रतिज्ञा लें कि अन्ना का सहयोग करेंगे। सड़कों पर उतरेंगे। वैसे ही जैसे कि मिस्र में राष्ट्रपति हुस्नी मुबारक को हटाने जनता सड़कों पर उतरी थी। वैसे ही जैसे कि यमन में जनता सड़कों पर आई थी, सीरीया, लीबिया (खाड़ी देश) से भी हम सीख सकते हैं। आइए शामिल होते हैं अन्ना के जन आंदोलन में, ताकि आने वाले कल में हम वाकई स्वतंत्रता की सांसें ले सकें और गर्व से कह सकें कि ‘हम आजाद हैं’।
  ‘जन लोकपाल कानून कोई पूरी व्यवस्था को ठीक कर देने का दावा नहीं है..यह तो सिर्फ इतनी सी पहल है भ्रष्टाचार करने वाले अफसर और नेताओं को जेल भेजा जाए....बस इतना सा है ये अभियान...... आइए इसमें साथ चलें..शायद हम और आप मिलकर इसे आन्दोलन बना सकें... जिससे वह भारत निकल सके जो हम आजादी के 63 साल बाद होना चाहते हैं...’

अन्ना के अभियान  से जुड़ने के लिए इस नंबर पर मिस्ड कॉल कर सकते हैं
02261550789

Saturday, April 2, 2011

आप क्या कर रहे हैं किसान भाई



    जो जमीन जिंदगी दे रही है, और जो जवान जमीन को अपना जमीर समझ रहा है। उसी की वजह से ही सारी दुनिया जीवित है। जीं हां मैं बात कर रहा हूं किसानों की, वो ही इंसान जो हर हाल में मेहनत करता है और अनाज पैदा करता है। उसी अनाज को खरीदकर देश की 80 फीसदी जनता खाती है। किसान को पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने जय जवान की संज्ञा दी थी। पर अब वह किसान भी लोभ में अंधा होता जा है। अपने खेतों तबाह करने में वह आगे बढ़ता ही जा रहा है। खेतों की नरवाई हटाने (गेहूं की कटाई के बाद बचा नीचे का कचरा) वह खेतों को आग लगा देता है, जिससे पूरा खेत जल जाता है और खेत एकदम साफ हो जाता है। पर इस काम को करने के बाद खेतों को जो नुकसान पहुंच रहा है उससे किसान अंजान है। आपको बता दें कि खेतों पर आग लगाने से खेतों की उर्वरा क्षमता कम हो जाती है। पर क्या करें किसानों को इस बात की जानकारी नहीं है या फिर वे किसी की बातें मानते ही नहीं।
क्या होता है नुकसान
-खेतों को साफ करने आग लगाने से मिट्टी भी जल जाती है।
-साथ ही जमीन में रहने वाले सूक्ष्म जीव जो कि फसलों के लिए महत्वपूर्ण होते हैं वे भी नष्ट हो जाते हैं। -जमीन की उर्वरा क्षमता कम हो जाती है।
-भूमि की जल धारण क्षमता कम होती है
ऐसे ही हजारों नुकसान होते हैं
ये करें किसान भाई
किसान भाईयों अगर आप अपने खेतों से उत्पादन हर  साल बढ़ाना चाहते हैं तो मेरी सलाह मानें या फिर कृषि अधिकारियों से मिलें। आप लोग गेहूं की कटनी के बाद रोटीवेटर से खेत जुतवाएं, इससे जो भी कचरा है वह जमीन के काफी अंदर पहुंच जाएगा। एक से दो साल के अंदर वह खाद बन जाएगा और फसल के लिए वरदान होगा। रोटीवेटर चलवाने में सिर्फ अधिकतम 400 रुपए एकड़ खर्च आएगा, लेकिन फायदा हजारों का।
खेतों को जलाना अपराध है
खेतों में आग लगाने के लिए जिला कलेक्टर नियम बनाते हैं। वे उन किसानों पर जुर्माना लगा सकते हैं जिनके खेतों में आग लगती है।


आईऐ देखें खेत जलाने से क्या-क्या जला, कितने किसान लुटे


घटना 30 मार्च की
-होशंगाबाद के डोलरिया, बघवाड़ा और माखननगर के गांव गनेरा में 30 मार्च को 25 एकड़ से ज्यादा की गेहूं की फसल राख हो गई। बघवाड़ा के पांच मकान भी आग में स्वाहा हो गए। -डोलरिया गांव में 30 एकड़ फसल आग की चपेट में आ गई।

-रायसेन के गोलवानी गांव में 30 मार्च को दोपहर 12 बजे लगी आग में 150 बकरियां, 5 बछड़े, दो गाय और 50 से ज्यादा मुर्गे-मुर्गियां जल गइं।
घटना 29 मार्च की
-29 मार्च को होशंगाबाद जिले के बाबई, सोहागपुर सहित कई गांवों में लाग लगी, जिसमें 1550 एकड़ क्षेत्र में सर्वाधिक नुकसान सिखाड़ गांव के किसानों को हुआ
-1000 एकड़ की फसल खाक हो गई। इसके अलावा रैपुरा, चीचली, खिड़िया, जमुनिया में करीब 500 एकड़ क्षेत्र में फसल जल गई। काजलखेड़ी गांव में भी दो एकड़ फसल और तीन एकड़ की नरबाई जल गई।
-सोहागपुर गांव में भी भूसा बनाने की मशीन से निकली आग के कारण 37 एकड़ गेहूं की फसल खाक हो गई।
-कलेक्टर निशंत  वखड़े ने नरवाई जलाने वालों पर सख्त कार्रवाई के आदेश दिए हैं। 

-परवलिया थाना क्षेत्र के ग्राम कुराना में 30 मार्च की सुबह 9 बजे खेत में आग लग गई, जिसमें 33 एकड़ की गेहूं की फसल खाक हो गई।
-बैरागढ़ के थाना खजूरी के ग्राम र्इंटखेड़ी में भी 30 मार्च को दो-दो एकड़ में गेहूं की फसल जलकर खाक हो गई।
-30 मार्च को ही ग्राम भौरी बकानिया में बद्रीप्रसाद के खेत में भी आग लग गई।

घटना 28 मार्च की
-28 मार्च को हरदा जिले के नांदरा में सैकड़ों एकड़ की गेहूं की फसल खाक हो गई। दोपहर एक बजे लगी आग पर रात 10 बजे काबू पाया जा सका।
-गांव के 50 से अधिक मकान भी जल गए। आग 15 किलोमीटर दूर स्थित आदमपुर, गोयत, गुल्लास, शमशाबाद, कांमियाखेड़ा, करवाना तक पहुच गई। यहां चार लोग झुलस गए और दो महिलाओं के पैर फ्रेक्चर हुए हैं।
-आदमपुर में भी भूसा निकालने की मशीन से चिंगारी निकली थी। तहसीलदार अलका एक्का के अनुसार 500 एकड़ की फसल जली
घटना 31 मार्च की
-भिण्ड के गोहद क्षेत्र के ग्राम धमसा के खेतों में गुरुवार को अचानक आग लग जाने से 12 किसानों का अनाज जलकर राख हो गया। मौके पर पहुंची चार दमकलों ने छह घंटे में आग पर काबू पाया।
-गोहद के अनुविभागीय अधिकारी राजस्व एसएल सोनी ने बताया कि ग्राम धमसा निवासी रमेश गोस्वामी के खेत में गुरुवार शाम अचानक आग लग गई थी।
-आग से 12 किसानों का करीब 100 क्विंटल से अधिक गल्ला जलकर राख हो गया।

-भिण्ड जिले के गोहद क्षेत्र के ग्राम धमसा के खेतों में गुरुवार को अचानक आग लग जाने से 12 किसानों का अनाज जलकर राख हो गया। गोहद के अनुविभागीय अधिकारी राजस्व एसएल सोनी ने बताया कि ग्राम धमसा निवासी रमेश गोस्वामी के खेत में गुरुवार शाम अचानक आग लग गई थी।12 किसानों का करीब 100 क्विंटल से अधिक गल्ला जलकर राख हो गया।