Wednesday, April 24, 2013

''बड़े भाई साहब'''


''बड़े भाई साहब'''
मेरे भाई साहब मुझसे पॉँच साल बडे थे, लेकिन तीन दरजे आगे। उन्‍होने भी उसी उम्र में पढना शुरू किया था जब मैने शुरू किया; लेकिन तालीम जैसे महत्‍व के मामले में वह जल्‍दीबाजी से काम लेना पसंद न करते थे। इस भवन कि बुनियाद खूब मजबूत डालना चाहते थे जिस पर आलीशान महल बन सके। एक साल का काम दो साल में करते थे। कभी-कभी तीन साल भी लग जाते थे। बुनियाद ही पुख्‍ता न हो, तो मकान कैसे पाएदार बने।
मैं छोटा था, वह बडे थे। मेरी उम्र नौ साल कि,वह चौदह साल ‍के थे। उन्‍हें मेरी तम्‍बीह और निगरानी का पूरा जन्‍मसिद्ध अधिकार था। और मेरी शालीनता इसी में थी कि उनके हुक्‍म को कानून समझूँ।
वह स्‍वभाव से बडे अघ्‍ययनशील थे। हरदम किताब खोले बैठे रहते और शायद दिमाग को आराम देने के लिए कभी कापी पर, कभी किताब के हाशियों पर चिडियों, कुत्‍तों, बल्लियो की तस्‍वीरें बनाया करते थें। कभी-कभी एक ही नाम या शब्‍द या वाक्‍य दस-बीस बार लिख डालते। कभी एक शेर को बार-बार सुन्‍दर अक्षर से नकल करते। कभी ऐसी शब्‍द-रचना करते, जिसमें न कोई अर्थ होता, न कोई सामंजस्‍य! मसलन एक बार उनकी कापी पर मैने यह इबारत देखी-स्‍पेशल, अमीना, भाइयों-भाइयों, दर-असल, भाई-भाई, राघेश्‍याम, श्रीयुत राघेश्‍याम, एक घंटे तक—इसके बाद एक आदमी का चेहरा बना हुआ था। मैंने चेष्‍टा की‍ कि इस पहेली का कोई अर्थ निकालूँ; लेकिन असफल रहा और उसने पूछने का साहस न हुआ। वह नवी जमात में थे, मैं पाँचवी में। उनकि रचनाओ को समझना मेरे लिए छोटा मुंह बडी बात थी।
मेरा जी पढने में बिलकुल न लगता था। एक घंटा भी किताब लेकर बैठना पहाड़ था। मौका पाते ही होस्‍टल से निकलकर मैदान में आ जाता और कभी कंकरियां उछालता, कभी कागज कि तितलियाँ उडाता, और कहीं कोई साथी ‍मिल गया तो पूछना ही क्‍या कभी चारदीवारी पर चढकर नीचे कूद रहे है, कभी फाटक पर वार, उसे आगे-पीछे चलाते हुए मोटरकार का आनंद उठा रहे है। लेकिन कमरे में आते ही भाई साहब का रौद्र रूप देखकर प्राण सूख जाते। उनका पहला सवाल होता-‘कहां थें?‘ हमेशा यही सवाल, इसी घ्‍वनि में पूछा जाता था और इसका जवाब मेरे पास केवल मौन था। न जाने मुंह से यह बात क्‍यों न निकलती कि जरा बाहर खेल रहा था। मेरा मौन कह देता था कि मुझे अपना अपराध स्‍वीकार है और भाई साहब के लिए इसके सिवा और कोई इलाज न था कि रोष से मिले हुए शब्‍दों में मेरा सत्‍कार करें।
‘इस तरह अंग्रेजी पढोगे, तो जिन्‍दगी-भर पढते रहोगे और एक हर्फ न आएगा। अँगरेजी पढना कोई हंसी-खेल नही है कि जो चाहे पढ ले, नही, ऐरा-गैरा नत्‍थू-खैरा सभी अंगरेजी कि विद्धान हो जाते। यहां रात-दिन आंखे फोडनी पडती है और खून जलाना पडता है, जब कही यह विधा आती है। और आती क्‍या है, हां, कहने को आ जाती है। बडे-बडे विद्धान भी शुद्ध अंगरेजी नही लिख सकते, बोलना तो दुर रहा। और मैं कहता हूं, तुम कितने घोंघा हो कि मुझे देखकर भी सबक नही लेते। मैं कितनी मेहनत करता हूं, तुम अपनी आंखो देखते हो, अगर नही देखते, जो यह तुम्‍हारी आंखो का कसूर है, तुम्‍हारी बुद्धि का कसूर है। इतने मेले-तमाशे होते है, मुझे तुमने कभी देखने जाते देखा है, रोज ही क्रिकेट और हाकी मैच होते हैं। मैं पास नही फटकता। हमेशा पढता रहा हूं, उस पर भी एक-एक दरजे में दो-दो, तीन-तीन साल पडा रहता हूं फिर तुम कैसे आशा करते हो कि तुम यों खेल-कुद में वक्‍त गंवाकर पास हो जाओगे? मुझे तो दो-ही-तीन साल लगते हैं, तुम उम्र-भर इसी दरजे में पडे सडते रहोगे। अगर तुम्‍हे इस तरह उम्र गंवानी है, तो बंहतर है, घर चले जाओ और मजे से गुल्‍ली-डंडा खेलो। दादा की गाढी कमाई के रूपये क्‍यो बरबाद करते हो?’
मैं यह लताड़ सुनकर आंसू बहाने लगता। जवाब ही क्‍या था। अपराध तो मैंने किया, लताड कौन सहे? भाई साहब उपदेश कि कला में निपुण थे। ऐसी-ऐसी लगती बातें कहते, ऐसे-ऐसे सूक्‍ति-बाण चलाते कि मेरे जिगर के टुकडे-टुकडे हो जाते और हिम्‍मत छूट जाती। इस तरह जान तोडकर मेहनत करने कि शक्‍ति मैं अपने में न पाता था और उस निराशा मे जरा देर के लिए मैं सोचने लगता-क्‍यों न घर चला जाऊँ। जो काम मेरे बूते के बाहर है, उसमे हाथ डालकर क्‍यो अपनी जिन्‍दगी खराब करूं। मुझे अपना मूर्ख रहना मंजूर था; लेकिन उतनी मेहनत से मुझे तो चक्‍कर आ जाता था। लेकिन घंटे–दो घंटे बाद निराशा के बादल फट जाते और मैं इरादा करता कि आगे से खूब जी लगाकर पढूंगा। चटपट एक टाइम-टेबिल बना डालता। बिना पहले से नक्‍शा बनाए, बिना कोई स्‍किम तैयार किए काम कैसे शुरूं करूं? टाइम-टेबिल में, खेल-कूद कि मद बिलकुल उड जाती। प्रात:काल उठना, छ: बजे मुंह-हाथ धो, नाश्‍ता कर पढने बैठ जाना। छ: से आठ तक अंग्रेजी, आठ से नौ तक हिसाब, नौ से साढे नौ तक इतिहास, ‍फिर भोजन और स्‍कूल। साढे तीन बजे स्‍कूल से वापस होकर आधा घंण्‍टा आराम, चार से पांच तक भूगोल, पांच से छ: तक ग्रामर, आघा घंटा होस्‍टल के सामने टहलना, साढे छ: से सात तक अंग्रेजी कम्‍पोजीशन, फिर भोजन करके आठ से नौ तक अनुवाद, नौ से दस तक हिन्‍दी, दस से ग्‍यारह तक विविध विषय, फिर विश्राम।
मगर टाइम-टेबिल बना लेना एक बात है, उस पर अमल करना दूसरी बात। पहले ही दिन से उसकी अवहेलना शुरू हो जाती। मैदान की वह सुखद हरियाली, हवा के वह हलके-हलके झोके, फुटबाल की उछल-कूद, कबड्डी के वह दांव-घात, वाली-बाल की वह तेजी और फुरती मुझे अज्ञात और अनिर्वाय रूप से खीच ले जाती और वहां जाते ही मैं सब कुछ भूल जाता। वह जान-लेवा टाइम-टेबिल, वह आंखफोड पुस्‍तके किसी कि याद न रहती, और फिर भाई साहब को नसीहत और फजीहत का अवसर मिल जाता। मैं उनके साये से भागता, उनकी आंखो से दूर रहने कि चेष्‍टा करता। कमरे मे इस तरह दबे पांव आता कि उन्‍हे खबर न हो। उनकि नजर मेरी ओर उठी और मेरे प्राण निकले। हमेशा सिर पर नंगी तलवार-सी लटकती मालूम होती। फिर भी जैसे मौत और विपत्‍ति के बीच मे भी आदमी मोह और माया के बंधन में जकडा रहता है, मैं फटकार और घुडकियां खाकर भी खेल-कूद का तिरस्‍कार न कर सकता।

2

सालाना इम्‍तहान हुआ। भाई साहब फेल हो गए, मैं पास हो गया और दरजे में प्रथम आया। मेरे और उनके बीच केवल दो साल का अन्‍तर रह गया। जी में आया, भाई साहब को आडें हाथो लूँ—आपकी वह घोर तपस्‍या कहाँ गई? मुझे देखिए, मजे से खेलता भी रहा और दरजे में अव्‍वल भी हूं। लेकिन वह इतने दु:खी और उदास थे कि मुझे उनसे दिल्‍ली हमदर्दी हुई और उनके घाव पर नमक छिडकने का विचार ही लज्‍जास्‍पद जान पडा। हां, अब मुझे अपने ऊपर कुछ अभिमान हुआ और आत्‍माभिमान भी बढा भाई साहब का वहरोब मुझ पर न रहा। आजादी से खेल–कूद में शरीक होने लगा। दिल मजबूत था। अगर उन्‍होने फिर मेरी फजीहत की, तो साफ कह दूँगा—आपने अपना खून जलाकर कौन-सा तीर मार लिया। मैं तो खेलते-कूदते दरजे में अव्‍वल आ गया। जबावसेयह हेकडी जताने कासाहस न होने पर भी मेरे रंग-ढंग से साफ जाहिर होता था कि भाई साहब का वह आतंक अब मुझ पर नहीं है। भाई साहब ने इसे भाँप लिया-उनकी ससहसत बुद्धि बडी तीव्र थी और एक दिन जब मै भोर का सारा समय गुल्‍ली-डंडे कि भेंट करके ठीक भोजन के समय लौटा, तो भाई साइब ने मानो तलवार खीच ली और मुझ पर टूट पडे-देखता हूं, इस साल पास हो गए और दरजे में अव्‍वल आ गए, तो तुम्‍हे दिमाग हो गया है; मगर भाईजान, घमंड तो बडे-बडे का नही रहा, तुम्‍हारी क्‍या हस्‍ती है, इतिहास में रावण का हाल तो पढ़ा ही होगा। उसके चरित्र से तुमने कौन-सा उपदेश लिया? या यो ही पढ गए? महज इम्‍तहान पास कर लेना कोई चीज नही, असल चीज है बुद्धि का विकास। जो कुछ पढो, उसका अभिप्राय समझो। रावण भूमंडल का स्‍वामी था। ऐसे राजो को चक्रवर्ती कहते है। आजकल अंगरेजो के राज्‍य का विस्‍तार बहुत बढा हुआ है, पर इन्‍हे चक्रवर्ती नहीं कह सकते। संसार में अनेको राष्‍ट़्र अँगरेजों का आधिपत्‍य स्‍वीकार नहीं करते। बिलकुल स्‍वाधीन हैं। रावण चक्रवर्ती राजा था। संसार के सभी महीप उसे कर देते थे। बडे-बडे देवता उसकी गुलामी करते थे। आग और पानी के देवता भी उसके दास थे; मगर उसका अंत क्‍या हुआ, घमंड ने उसका नाम-निशान तक मिटा दिया, कोई उसे एक चिल्‍लू पानी देनेवाला भी न बचा। आदमी जो कुकर्म चाहे करें; पर अभिमान न करे, इतराए नही। अभिमान किया और दीन-दुनिया से गया।
शैतान का हाल भी पढा ही होगा। उसे यह अनुमान हुआ था कि ईश्‍वर का उससे बढकर सच्‍चा भक्‍त कोई है ही नहीं। अन्‍त में यह हुआ कि स्‍वर्ग से नरक में ढकेल दिया गया। शाहेरूम ने भी एक बार अहंकार किया था। भीख मांग-मांगकर मर गया। तुमने तो अभी केवल एक दरजा पास किया है और अभी से तुम्‍हारा सिर फिर‍ गया, तब तो तुम आगे बढ चुके। यह समझ लो कि तुम अपनी मेहनत से नही पास हुए, अन्‍धे के हाथ बटेर लग गई। मगर बटेर केवल एक बार हाथ लग सकती है, बार-बार नहीं। कभी-कभी गुल्‍ली-डंडे में भी अंधा चोट निशाना पड़ जाता है। उससे कोई सफल खिलाड़ी नहीं हो जाता। सफल खिलाड़ी वह है, जिसका कोई निशान खाली न जाए।
मेरे फेल होने पर न जाओ। मेरे दरजे में आओगे, तो दाँतो पसीना आयगा। जब अलजबरा और जामेंट्री के लोहे के चने चबाने पड़ेंगे और इंगलिस्‍तान का इतिहास पढ़ना पड़ेंगा! बादशाहों के नाम याद रखना आसान नहीं। आठ-आठ हेनरी को गुजरे है कौन-सा कांड किस हेनरी के समय हुआ, क्‍या यह याद कर लेना आसान समझते हो? हेनरी सातवें की जगह हेनरी आठवां लिखा और सब नम्‍बर गायब! सफाचट। सिर्फ भी न मिलगा, सिफर भी! हो किस ख्‍याल में! दरजनो तो जेम्‍स हुए हैं, दरजनो विलियम, कोडियों चार्ल्‍स दिमाग चक्‍कर खाने लगता है। आंधी रोग हो जाता है। इन अभागो को नाम भी न जुडते थे। एक ही नाम के पीछे दोयम, तेयम, चहारम, पंचम नगाते चले गए। मुछसे पूछते, तो दस लाख नाम बता देता।
और जामेट्री तो बस खुदा की पनाह! अ ब ज की जगह अ ज ब लिख दिया और सारे नम्‍बर कट गए। कोई इन निर्दयी मुमतहिनों से नहीं पूछता कि आखिर अ ब ज और अ ज ब में क्‍या फर्क है और व्‍यर्थकी बात के लिए क्‍यो छात्रो का खून करते हो दाल-भात-रोटी खायी या भात-दाल-रोटी खायी, इसमें क्‍या रखा है; मगर इन परीक्षको को क्‍या परवाह! वह तो वही देखते है, जो पुस्‍तक में लिखा है। चाहते हैं कि लडके अक्षर-अक्षर रट डाले। और इसी रटंत का नाम शिक्षा रख छोडा है और आखिर इन बे-सिर-पैर की बातो के पढ़ने से क्‍या फायदा?
इस रेखा पर वह लम्‍ब गिरा दो, तो आधार लम्‍ब से दुगना होगा। पूछिए, इससे प्रयोजन? दुगना नही, चौगुना हो जाए, या आधा ही रहे, मेरी बला से, लेकिन परीक्षा में पास होना है, तो यह सब खुराफात याद करनी पड़ेगी। कह दिया-‘समय की पाबंदी’ पर एक निबन्‍ध लिखो, जो चार पन्‍नो से कम न हो। अब आप कापी सामने खोले, कलम हाथ में लिये, उसके नाम को रोइए।
कौन नहीं जानता कि समय की पाबन्‍दी बहुत अच्‍छी बात है। इससे आदमी के जीवन में संयम आ जाता है, दूसरो का उस पर स्‍नेह होने लगता है और उसके करोबार में उन्‍नति होती है; जरा-सी बात पर चार पन्‍ने कैसे लिखें? जो बात एक वाक्‍य में कही जा सके, उसे चार पन्‍ने में लिखने की जरूरत? मैं तो इसे हिमाकत समझता हूं। यह तो समय की किफायत नही, बल्‍कि उसका दुरूपयोग है कि व्‍यर्थ में किसी बात को ठूंस दिया। हम चाहते है, आदमी को जो कुछ कहना हो, चटपट कह दे और अपनी राह ले। मगर नही, आपको चार पन्‍ने रंगने पडेंगे, चाहे जैसे लिखिए और पन्‍ने भी पूरे फुल्‍सकेप आकार के। यह छात्रो पर अत्‍याचार नहीं तो और क्‍या है? अनर्थ तो यह है कि कहा जाता है, संक्षेप में लिखो। समय की पाबन्‍दी पर संक्षेप में एक निबन्‍ध लिखो, जो चार पन्‍नो से कम न हो। ठीक! संक्षेप में चार पन्‍ने हुए, नही शायद सौ-दो सौ पन्‍ने लिखवाते। तेज भी दौडिए और धीरे-धीरे भी। है उल्‍टी बात या नही? बालक भी इतनी-सी बात समझ सकता है, लेकिन इन अध्‍यापको को इतनी तमीज भी नहीं। उस पर दावा है कि हम अध्‍यापक है। मेरे दरजे में आओगे लाला, तो ये सारे पापड बेलने पड़ेंगे और तब आटे-दाल का भाव मालूम होगा। इस दरजे में अव्‍वल आ गए हो, वो जमीन पर पांव नहीं रखते इसलिए मेरा कहना मानिए। लाख फेल हो गया हूँ, लेकिन तुमसे बड़ा हूं, संसार का मुझे तुमसे ज्‍यादा अनुभव है। जो कुछ कहता हूं, उसे ‍ गिरह बांधिए नही पछताएँगे।
स्‍कूल का समय निकट था, नहीं इश्‍वर जाने, यह उपदेश-माला कब समाप्‍त होती। भोजन आज मुझे निस्‍स्‍वाद-सा लग रहा था। जब पास होने पर यह तिरस्‍कार हो रहा है, तो फेल हो जाने पर तो शायद प्राण ही ले लिए जाएं। भाई साहब ने अपने दरजे की पढाई का जो भयंकर चित्र खीचा था; उसने मुझे भयभीत कर दिया। कैसे स्‍कूल छोडकर घर नही भागा, यही ताज्‍जुब है; लेकिन इतने तिरस्‍कार पर भी पुस्‍तकों में मेरी अरूचि ज्‍यो-कि-त्‍यों बनी रही। खेल-कूद का कोई अवसर हाथ से न जाने देता। पढ़ता भी था, मगर बहुत कम। बस, इतना कि रोज का टास्‍क पूरा हो जाए और दरजे में जलील न होना पडें। अपने ऊपर जो विश्‍वास पैदा हुआ था, वह फिर लुप्‍त हो गया और ‍‍फिर चोरो का-सा जीवन कटने लगा।

3

फिर सालाना इम्‍तहान हुआ, और कुछ ऐसा संयोग हुआ कि मै ‍‍‍‍‍‍िफ‍र पास हुआ और भाई साहब फिर ‍फेल हो गए। मैंने बहुत मेहनत न की पर न जाने, कैसे दरजे में अव्‍वल आ गया। मुझे खुद अचरज हुआ। भाई साहब ने प्राणांतक परिश्रम किया था। कोर्स का एक-एक शब्‍द चाट गये थे; दस बजे रात तक इधर, चार बजे भोर से उभर, छ: से साढे नौ तक स्‍कूल जाने के पहले। मुद्रा कांतिहीन हो गई थी, मगर बेचारे फेल हो गए। मुझे उन पर दया आ‍ती‍‍ थी। नतीजा सुनाया गया, तो वह रो पड़े और मैं भी रोने लगा। अपने पास होने वाली खुशी आधी हो गई। मैं भी फेल हो गया होता, तो भाई साहब को इतना दु:ख न होता, लेकिन विधि की बात कौन टाले?
मेरे और भाई साहब के बीच में अब केवल एक दरजे का अन्‍तर और रह गया। मेरे मन में एक कुटिल भावना उदय हुई कि कही भाई साहब एक साल और फेल हो जाएँ, तो मै उनके बराबर हो जाऊं, ‍िफर वह किस आधार पर मेरी फजीहत कर सकेगे, लेकिन मैंने इस कमीने विचार को दिल‍ से बलपूर्वक निकाल डाला। आखिर वह मुझे मेरे हित के विचार से ही तो डांटते हैं। मुझे उस वक्‍त अप्रिय लगता है अवश्‍य, मगर यह शायद उनके उपदेशों का ही असर हो कि मैं दनानद पास होता जाता हूं और इतने अच्‍छे नम्‍बरों से।
अबकी भाई साहब बहुत-कुछ नर्म पड़ गए थे। कई बार मुझे डांटने का अवसर पाकर भी उन्‍होंने धीरज से काम लिया। शायद अब वह खुद समझने लगे थे कि मुझे डांटने का अधिकार उन्‍हे नही रहा; या रहा तो बहुत कम। मेरी स्‍वच्‍छंदता भी बढी। मैं उनकि सहिष्‍णुता का अनुचित लाभ उठाने लगा। मुझे कुछ ऐसी धारणा हुई कि मैं तो पास ही हो जाऊंगा, पढू या न पढूं मेरी तकदीर बलवान् है, इसलिए भाई साहब के डर से जो थोडा-बहुत बढ लिया करता था, वह भी बंद हुआ। मुझे कनकौए उडाने का नया शौक पैदा हो गया था और अब सारा समय पतंगबाजी ही की भेंट होता था, ‍िफर भी मैं भाई साहब का अदब करता था, और उनकी नजर बचाकर कनकौए उड़ाता था। मांझा देना, कन्‍ने बांधना, पतंग टूर्नामेंट की तैयारियां आदि समस्‍याएँ अब गुप्‍त रूप से हल की जाती थीं। भाई साहब को यह संदेह न करने देना चाहता था कि उनका सम्‍मान और लिहाज मेरी नजरो से कम हो गया है।
एक दिन संध्‍या समय होस्‍टल से दूर मै एक कनकौआ लूटने बंतहाशा दौडा जा रहा था। आंखे आसमान की ओर थीं और मन उस आकाशगामी पथिक की ओर, जो मंद गति से झूमता पतन की ओर चला जा रहा था, मानो कोई आत्‍मा स्‍वर्ग से निकलकर विरक्‍त मन से नए संस्‍कार ग्रहण करने जा रही हो। बालकों की एक पूरी सेना लग्‍गे और झड़दार बांस लिये उनका स्‍वागत करने को दौड़ी आ रही थी। किसी को अपने आगे-पीछे की खबर न थी। सभी मानो उस पतंग के साथ ही आकाश में उड़ रहे थे, जहॉं सब कुछ समतल है, न मोटरकारे है, न ट्राम, न गाडियाँ।
सहसा भाई साहब से मेरी मुठभेड हो गई, जो शायद बाजार से लौट रहे थे। उन्‍होने वही मेरा हाथ पकड लिया और उग्रभाव से बोले-इन बाजारी लौंडो के साथ धेले के कनकौए के लिए दौड़ते तुम्‍हें शर्म नही आती? तुम्‍हें इसका भी कुछ लिहाज नहीं कि अब नीची जमात में नहीं हो, बल्कि आठवीं जमात में आ गये हो और मुझसे केवल एक दरजा नीचे हो। आखिर आदमी को कुछ तो अपनी पोजीशन का ख्याल करना चाहिए। एक जमाना था कि कि लोग आठवां दरजा पास करके नायब तहसीलदार हो जाते थे। मैं कितने ही मिडलचियों को जानता हूं, जो आज अव्‍वल दरजे के डिप्‍टी मजिस्‍ट्रेट या सुपरिटेंडेंट है। कितने ही आठवी जमाअत वाले हमारे लीडर और समाचार-पत्रो के सम्‍पादक है। बडें-बडें विद्धान उनकी मातहती में काम करते है और तुम उसी आठवें दरजे में आकर बाजारी लौंडों के साथ कनकौए के लिए दौड़ रहे हो। मुझे तुम्‍हारी इस कमअकली पर दु:ख होता है। तुम जहीन हो, इसमें शक नही: लेकिन वह जेहन किस काम का, जो हमारे आत्‍मगौरव की हत्‍या कर डाले? तुम अपने दिन में समझते होगे, मैं भाई साहब से महज एक दर्जा नीचे हूं और अब उन्‍हे मुझको कुछ कहने का हक नही है; लेकिन यह तुम्‍हारी गलती है। मैं तुमसे पांच साल बडा हूं और चाहे आज तुम मेरी ही जमाअत में आ जाओ–और परीक्षकों का यही हाल है, तो निस्‍संदेह अगले साल तुम मेरे समकक्ष हो जाओगे और शायद एक साल बाद तुम मुझसे आगे निकल जाओ-लेकिन मुझमें और जो पांच साल का अन्‍तर है, उसे तुम क्‍या, खुदा भी नही मिटा सकता। मैं तुमसे पांच साल बडा हूं और हमेशा रहूंगा। मुझे दुनिया का और जिन्‍दगी का जो तजरबा है, तुम उसकी बराबरी नहीं कर सकते, चाहे तुम एम. ए., डी. फिल. और डी. लिट. ही क्‍यो न हो जाओ। समझ किताबें पढने से नहीं आती है। हमारी अम्‍मा ने कोई दरजा पास नही किया, और दादा भी शायद पांचवी जमाअत के आगे नही गये, लेकिन हम दोनो चाहे सारी दुनिया की विधा पढ ले, अम्‍मा और दादा को हमें समझाने और सुधारने का अधिकार हमेशा रहेगा। केवल इसलिए नही कि वे हमारे जन्‍मदाता है, ब‍ल्कि इसलिए कि उन्‍हे दुनिया का हमसे ज्‍यादा जतरबा है और रहेगा। अमेरिका में किस जरह कि राज्‍य-व्‍यवस्‍था है और आठवे हेनरी ने कितने विवाह किये और आकाश में कितने नक्षत्र है, यह बाते चाहे उन्‍हे न मालूम हो, लेकिन हजारों ऐसी आते है, जिनका ज्ञान उन्‍हे हमसे और तुमसे ज्‍यादा है।
दैव न करें, आज मैं बीमार हो आऊं, तो तुम्‍हारे हाथ-पांव फूल जाएगें। दादा को तार देने के सिवा तुम्‍हे और कुछ न सूझेंगा; लेकिन तुम्‍हारी जगह पर दादा हो, तो किसी को तार न दें, न घबराएं, न बदहवास हों। पहले खुद मरज पहचानकर इलाज करेंगे, उसमें सफल न हुए, तो किसी डांक्‍टर को बुलायेगें। बीमारी तो खैर बडी चीज है। हम-तुम तो इतना भी नही जानते कि महीने-भर का महीने-भर कैसे चले। जो कुछ दादा भेजते है, उसे हम बीस-बाईस तक र्खच कर डालते है और पैसे-पैसे को मोहताज हो जाते है। नाश्‍ता बंद हो जाता है, धोबी और नाई से मुंह चुराने लगते है; लेकिन जितना आज हम और तुम र्खच कर रहे है, उसके आधे में दादा ने अपनी उम्र का बडा भाग इज्‍जत और नेकनामी के साथ निभाया है और एक कुटुम्‍ब का पालन किया है, जिसमे सब मिलाकर नौ आदमी थे। अपने हेडमास्‍टर साहब ही को देखो। एम. ए. हैं कि नही, और यहा के एम. ए. नही, आक्‍यफोर्ड के। एक हजार रूपये पाते है, लेकिन उनके घर इंतजाम कौन करता है? उनकी बूढी मां। हेडमास्‍टर साहब की डिग्री यहां बेकार हो गई। पहले खुद घर का इंतजाम करते थे। खर्च पूरा न पड़ता था। करजदार रहते थे। जब से उनकी माताजी ने प्रबंध अपने हाथ मे ले लिया है, जैसे घर में लक्ष्‍मी आ गई है। तो भाईजान, यह जरूर दिल से निकाल डालो कि तुम मेरे समीप आ गये हो और अब स्‍वतंत्र हो। मेरे देखते तुम बेराह नही चल पाओगे। अगर तुम यों न मानोगे, तो मैं (थप्‍पड दिखाकर) इसका प्रयोग भी कर सकता हूं। मैं जानता हूं, तुम्‍हें मेरी बातें जहर लग रही है।
मैं उनकी इस नई युक्‍ति से नतमस्‍तक हो गया। मुझे आज सचमुच अपनी लघुता का अनुभव हुआ और भाई साहब के प्रति मेरे तम में श्रद्धा उत्‍पन्‍न हुईं। मैंने सजल आंखों से कहा-हरगिज नही। आप जो कुछ फरमा रहे है, वह बिलकुल सच है और आपको कहने का अधिकार है।
भाई साहब ने मुझे गले लगा लिया और बाल-कनकाए उड़ान को मना नहीं करता। मेरा जी भी ललचाता है, लेकिन क्या करूँ, खुद बेराह चलूं तो तुम्हारी रक्षा कैसे करूँ? यह कर्त्तव्य भी तो मेरे सिर पर है।
संयोग से उसी वक्त एक कटा हुआ कनकौआ हमारे ऊपर से गुजरा। उसकी डोर लटक रही थी। लड़कों का एक गोल पीछे-पीछे दौड़ा चला आता था। भाई साहब लंबे हैं ही, उछलकर उसकी डोर पकड़ ली और बेतहाशा होटल की तरफ दौड़े। मैं पीछे-पीछे दौड़ रहा था।

Thursday, April 4, 2013

habibganj indore double dacker train

habibganj indore double dacker train17 से दौड़ेगी डबल डेकर ट्रेन............ 
habibganj indore double dacker train

habibganj indore double dacker train

habibganj indore double dacker train

habibganj indore double dacker train

भोपाल- इंदौर डबल डेकर ट्रेन

  सीधे ट्रेन से..........दीपक राय की लाइव रिपोर्ट

भोपाल से इंदौर के बीच डबलडेकर 17 अप्रैल से शुरू हो सकती है। हरी झंडी दिखाने रेल मंत्री पवन बंसल आएंगे। बुधवार रात आठ बजे डबलडेकर के रेक हबीबगंज पहुंच गए। इसी दिन रहे छठे प्लेटफार्म का उद्घाटन हो सकता है।
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सुबह 6 बजे चलेगी
ट्रेन नंबर 22183 हबीबगंज से सुबह 6 बजे चलकर वाया मक्सी देवास होते हुए इंदौर 9: 40 बजे पहुंचेगी। वहीं 22184 इंदौर से शाम 7:35 बजे चलक रात 11 बजे भोपाल पहुंचेगी। इसी तरह 22185 हबीबगंज से 2:35 बजे चलकर इंदौर 6:50 बजे पहुंचेगी। यह ट्रेन वाया उज्जैन होते हुए जाएगी। साथ ही 22186 इंदौर भोपाल सुबह दस बजकर दस मिनट पर चलकर दोपहर 2 बजकर पांच मिनट पर भोपाल पहुंचेगी। यह ट्रेन सीहौर, देवास उज्जैन होकर चलेगी।
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295 रुपए किराया
224 किलोमीटर दूरी
110 किमी प्रति घंटा रफ्तार
14 कोच की संख्या
120 सीटें प्रति कोच
3 घंटे 40 मिनट में तय होगा सफर

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इस मार्ग पर चलेगी
भोपाल-इंदौर के बीच दो रैक चलना है। एक रैक भोपाल से रवाना होकर वाया उजैन देवास इंदौर पहुंचेगा, जबकि दूसरा रैक हबीबगंज से रवाना होकर वाया मक्सी देवास होकर इंदौर पहुंचेगा।
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-इतना ही किराया किराया इंदौर-हबीबगंज इंटरसिटी एक्सप्रेस की चेयरकार श्रेणी में लगता है

Monday, January 7, 2013

बड़ा सवाल? कैसा है हमारे देश का कानून?

76 जवानों की मौत के सभी 10 आरोपी बरी
याद कीजिए, 6 अप्रैल। साल 2010। छत्तीसगढ़ का बस्तर जिला। ताड़मेटला नामक जंगल। घात लगाए नक्सलवादी। सीआरपीएफ जवानों पर निशाना। जवान चले जा रहे हैं। चुपचाप। घना जंगल। अचानक गोलीबारी होती है। 76 बेकसूर जवानों की मौत। नक्सलवादी जंगल में दुबक जाते हैं। कई महिलाओं की मांग सूनी। कई मां के बेटे छिन जाते हैं। देश सेवा करते मारे जाते हैं। इस मामले में दस आरोपियों को गिरफ्तार किया जाता है। शेष आरोपियों को फरार बताया जाता है। 7 जनवरी 2013 का दिन। कोर्ट फैसला करता है। सभी आरोपी बरी। उन्हें संदेह का लाभ देते हुए बरी किया गया जाता है।  ऐसे में कौन माता अपने बेटे को देश सेवा करने भेजेगी। बड़ा सवाल? कैसा है हमारे देश का कानून?

Wednesday, October 10, 2012

दो मुद्दे, दिखावे कुछ, सच्चाई कुछ


1. हरियाणा में डीएलएफ का बड़ा कारोबार है। दिल्ली से सटे राज्य में सोनिया गांधी के दामाद राबर्ट वाड्रा ने डीएलएफ की मदद कर अरबों की संपत्ति बनाई है। जीं हां मंगलवार को सोनिया हरियाणा पहुंची, बहाना था रेप पीडि़तों से मिलना। सोनिया उन्हें सहानूभूति दे आईं। आखिर देना भी चाहिए। राज्य में एक महीने के भीतर बलात्कार के 15 मामले सामने आ गए
.........पर कहानी अभी बाकी है मेरे दोस्त
सोनिया बोलीं रेप तो देशभर में हो रहा है। यानी वे रेप पीडि़तों से मिलने का बहाना निकालकर अपने दामाद की बात करने हरियाणा पहुंचीं होगी। या यूं कहें मामला सुलटाना तो पड़ेगा न भई आखिर सासु मां जो ठहरीं।
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2. ममता बनर्जी ने 72 घंटे का समय दिया। सरकार नहीं मानी तो समर्थन वापस ले लिया। सरकार की निगाहें सपा और बसपा पर टिक गईं। सपा तो दोस्त है कांग्रेस की। बहुजन समाज पार्टी की मायावती भी बोलीं हां हम भी अभी यूपीए सरकार का साथ देंगे।
...............पर कहानी अभी बाकी है मेरे दोस्त
मायावती बुधवार को फैसला सुनाने वाली थीं, मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश ने उनकी नींद उड़ा दी। आय से अधिक दौलत कमाने के मामले में कोर्ट ने केंद्र सरकार और सीबीआई को फटकार लगाई। यानी माया की जांच हो। एक दिन बीता और केंद्र से मिल गईं मायावती। चलो जांच में ढील तो मिली।

Sunday, July 8, 2012

कमीशन के भूखे ‘भगवान’

prakash amte aur mandaki amte. hamare doctor inse kuch to sekh sakte hai.

राम-रावण का युद्ध चल रहा था। रावण का बेटा मेघनाद और लक्ष्मण जी भिड़ गए। लक्ष्मण जी से हारने की कगार पर पहुंचे मेघनाद ने शक्तिबाण चला दिया। लक्ष्मण जी मूर्छित हो गए। अब ऐसा डॉक्टर की तलाश शुरू हुई जो लक्ष्मण जी का इलाज कर सके। अब डॉक्टर भी मिले तो दुश्मन रावण के मुल्क के। सुषेण नामक वैद्य जी हां। वैद्य ने दोस्ती देखी न दुश्मनी और लक्ष्मण जी का इलाज किया।
ऐसे होते थे वैद्य डॉक्टर
अब बाबा आम्टे की बात करते हैं। दुनिया भर में प्रसिद्धि बटोरने वाले सच्चे जनसेवक थे बाबा आम्टे। बचपन में चांदी के पलंगों में सोने वाले बाबा ने जवानी समाजसेवा को समर्पित कर दिया। उनके बेटे और बहू जो कि पेशे से डॉक्टर हैं वे भी पैसे नहीं समाजसेवा कमा रहे हैं। प्रकाश और बहू मंदाकिनी आम्टे महाराष्ट्र में कुष्ठ रोगियों के लिए सेवा में समर्पित हैं....
आप सोच रहे होंगे कि मैं इनकी बात क्यों कर रहा हूं। आपके सवालों का जवाब नीचे है
आजकल अधिकतर डॉक्टर बेईमान हो गए हैं। दवा कंपनियों से पैसे और गिफ्ट लेने की बातें तो पहले भी सुनी थीं। मैंने तो यहां तक सुना था कि कई कंपनियां डॉक्टरों को फ्लैट भी गिफ्ट करती हैं। पर रविवार को पढ़ी खबर से सन्न रह गया। एक दवा कंपनी ने लाखों रुपए खर्च कर डॉक्टरों को विदेश की सौर करवा दी। मात्र टिकट ही 12 लाख रुपए का था। सोचिए पूरी यात्रा में कितने रुपए खर्च हुए होंगे।
इन डॉक्टरों से इलाज कराने वाले कई मरीज ऐसे होते हैं, जो जिंदगी भर मेहनत से रुपए कमाते हैं और एकसाथ 12 हजार रुपए भी नहीं देख पाते। जब बीमार पड़ते हैं तो डॉक्टर कमीशन के चक्कर में महंगी दवाएं लिखते हैं, गरीबों को जिंदगी बचाने के लिए दवाएं खरीदनी पड़ती हैं। डॉक्टर चाहें तो सस्ती दवाएं भी लिख सकते हैं। पर ऐसे में विदेश घूमने को कहां मिलेगा।
एक डॉक्टर ईमानदारी से भी काम करे तो वह इतना  कमा सकता है कि उसका जीवन बेहतर कट सकता है। फिर कई डॉक्टर लोगों से खिलवाड़ क्यों कर रहे हैं। पैसों के लोभ में इतनी महंगी दवाएं क्यों लिख देते हैं कि बिल देखकर ही लोग मर जाएं। आखिर विदेश सैर या गिफ्ट की भूख से भगवान बेइमान क्यों बन रहा है।
मैं ऐसे दर्जनों डॉक्टरों को जानता हूं, जो हफ्ते में एक दिन नि: शुल्क परामर्श देते हैं और हो सके तो उन्हें दवाएं भी उपलब्ध कराते हैं। ऐसे समाजिक सेवा करने वाले डॉक्टर भी तो पैसों के लोभी हो सकते हैं पर अभी तक वे बचे हुए हैं। शायद वे सच्चाई जानते हैं। जो भी हो भगवान कहे जाने वाले डॉक्टरों को कुछ तो शर्म करनी चाहिए। ज्यादा से ज्यादा यह होगा कि उन्हें विदेश यात्रा नहीं मिलेगी। उन्हें गिफ्ट नहीं मिलेंगे, लेकिन हां सबसे बड़ी चीज मिलेगी। मरीजों की दुआ।

Sunday, April 22, 2012

ऐसे, कैसे चलेगा काम?

IAS Manan

mla manghi

r vinel krihna IAS
  दो राज्य, दो कलेक्टर, दोनों आईएएस (प्रमोटी नहीं) दोनों बेहद पढ़े-लिखे, दोनों में समाज सेवा का जज्बा और जोश, दोनों में देश के बदलाव की चाहत, दोनों को चाहने वालों की लंबी लाइनें, दोनों इमानदार, दोनों पड़ोसी राज्यों में नियुक्त हैं (आर. वीनिल कृष्णा-ओडीशा, एलेक्स पॉल मेनन-छत्तीसगढ़), दोनों लोगों की समस्या जानने, लोगों को जागरूक करने भयानक जंगलों में घुसते हैं, दोनों सरकारी तामझाम से दूर। सिर्फ कुछ गार्डों के साथ, दोनों को सिर्फ काम से मतलब, नक्सलियों के इलाके में नक्सलियों के खिलाफत, जनता को विकास से जोड़ने की जोशीली बातें। बस यही कारण उनके लिए मुसीबत बन जाता है। पर ऐसे अधिकारियों के जज्बे को सलाम। क्योंकि वे उन नेताओं से बेहतर हैं जो गार्डों के घेरे और हेलीकॉप्टर के बिना कहीं नहीं जाते।
अब 16 फरवरी 2011 की शाम को याद कीजिए, उड़ीसा के मलकानगिरी कलेक्टर आर. वीनिल कृष्णा का अपहरण कर लिया गया वे एक ग्राम विकास कार्यक्रम में पहुंचे और इंजीनियर द्वारा बनाए गए पुल की जांच खुद पहुंच गए। पुल तक पहुंचे ही थे, घात लगाए नक्सलियों ने उन्हें पकड़ लिया। 7 दिन बाद मांगें मनवाने पर ही नक्सलियों ने कृष्णा को रिहा किया। करीब 14 महीने गुजरे राज्य बदल गया, 21 अप्रैल 2012, को छत्तीसगढ़ के नए जिले सुकमा कलेक्टर आईएएस एलेक्स पॉल मेनन का अपहरण। मेनन भी ग्राम सुराज अभियान में शामिल होने माझीपारा गांव पहुंचे थे। सीईओ से कलेक्टर बने 2006 बैच के भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी को शायद पेचीदगियों का अनुमान नहीं था कि सच्चाई सुनने के आदी भारत में कम ही मिलते हैं। खासकर जब नेताओं ने गरीबों को कुचला है, उनके अधिकारों का अतिक्रमण किया है। मेनन लोगों को जीने के तरीके बता रहे थे, वहीं आम आदमी बनकर आए नक्सलियों को उनकी बातें चुभने लगीं और कलेक्टर को घेर लिया।

हमारे इमानदार कर्मचारी
इमानदारी और कलेक्टर की लोकप्रियता देखिए, सिर्फ दो गार्ड 20 से ज्यादा नक्सलियों से भिड़ गए और अपने अधिकारी को बचाने के लिए शहीद हो गए। नक्सलियों का काला चेहरा इसी से बेनकाब होता है। हो सकता है कि आम नागरिकों से नक्सली बने इन आतंकियों के साथ कुछ गलत हुआ हो। पर इसका मतलब कतई नहीं कि आम पुलिस वालों की हत्या कर दी जाए, जरा सोचिए अपने परिवार से दूर इन जवानों के बारे में जो दिन-रात जंगल में रहते हैं। लोगों की सेवा करते हैं। नक्सलियों को देखने पर उन्हें चुनौती देते हैं, अचानक गोली नहीं चलाते। इसी के उलट नक्सलवादी अचानक हमले कर उनकी हत्या कर देते हैं। सोचिए इन गार्डों के परिवारों पर क्या गुजरती होगी। 10 से 12 हजार रुपए कमाने वाले सपूतों को खो देते हैं। जंगल पर नक्सलियों का राज कायम है। सरकार सिर्फ एयर कंडीशनर कमरों में बैठकर मीटिंग लेती है और आदेश देती है कि नक्सलियों से सख्ती से निपटा जाए। जान गंवाते हैं हमारे आम जवान और ऐसे लोग या ग्राम प्रधान जो पुलिस का सहयोग करते हैं। नक्सली उन लोगों को जिंदा जला देते हैं, जिनपर उन्हें शक होता है कि यह हमारी खबर सरकार तक पहुंचा रहे हैं। ऐसे में छत्तीसगढ़ में चल रहे ग्राम सुराज क्या गुल खिलाएगा। जब अभियान में जाने वाले अधिकारी तक सुरक्षित नहीं होते, मुंह खोलने वाले लोगों को जान गंवानी पड़ती है तो फिर गांव वाले कैसे नक्सलियों के विरोधी बन सकते हैं।

रील लाइफ से रियल में आते हैं
शोले तो सभी ने देखी होगी। गब्बर के इलाके में जब एक इमानदार पुलिसवाला आता है तो उसके हाथ काट दिए जाते हैं। दो अपराधी जब लोगों को जागरूक करने आते हैं तो कई ग्रामीणों की जान डाकु ले लेते हैं। शहर पढ़ने जाने वाले युवक की हत्या कर देत हैं। ऐसे में रील लाइफ तो हीरो को हीरो बना देती है।
पर देखिए छत्तीगढ़ के जंगलों में रहने वाले लोग क्यों जान गवाएंगे। जहां सरकार नहीं पहुंचती, योजनाओं का लाभ नहीं मिलता, ऐसी जगहों पर नक्सली विराजमान हैं। अब जनता की सरकार तो नक्सली ही हुए न। रियल लाइफ में डाकू गब्बर को मारना आसान नहीं है।

अपहरण पर अपहरण, उदासीन सरकार, आतंकियों के बुलंद हौसले
ओडीशा में दो इतालवी पर्यटकों का अपहरण हो या फिर 24 मार्च को हुए सत्तारूढ़ पार्टी बीजू जनता दल (बीजद) के विधायक झिना हिकाका (34 साल) का अपहरण, सभी मामले में सरकार सिर्फ मिटिंग लेती है। नक्सली हर बार अपनी मांगें मनवा लेते हैं। पर अब चिंता पहले से कहीं गंभीर हैं।
-विधायक
-दो कलेक्टर
इन चिंताओं पर बयानबाजी की बारिशें होती हैं। बस निष्कर्ष कुछ नहीं निकलता।

5000 किमी तो वार कर लेंगे, देश का क्या
देश के 28 स्वतंत्र राज्यों में छत्तीसगढ़, कर्नाटक, ओडीशा, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, झारखंड, पश्चिम बंगाल और बिहार-उत्तर प्रदेश में आंशिक रूप से नक्सली व्याप्त हैं। ऐसे में क्या कहा जाए। देश आजाद होने के 60 साल से ज्यादा बीत गए। अग्नि-5 विदेशों में चमक रही है। 5 हजार किमी तक मार करने वाली मिसाइल से हम दुनियाभर से बच सकते हैं। वहां हमले कर सकते हैं, लेकिन देश के अंदर ऐसा क्या हो गया कि मुठ्ठी भर नक्सलियों को निशाना नहीं बना पाए।

विदेशों से सीखें
अमेरिका घर बैठे-बैठे इस्लामाबाद में दुनिया के सबसे बड़े आतंकी लादेन को मार गिराता है। लीबिया की जनता तानाशाह शासक गद्दाफी को पुल के अंदर से   निकालकर मौत देती है। ऐसे में हमारे देश की सरकार की ऐसी क्या मजबूरी है कि नक्सलियों पर नियंत्रण नहीं रख पा रही है।

कैसे कसी कमर
16 अप्रैल, जगह नई दिल्ली, मुद्दा नक्सलवादी। सभी नक्सल प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्री, देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, गृह मंत्री पी चिदंबरम। इन सभी ने मीटिंग की। कहा- नक्सलियों पर लगाम लगाकर रहेंगे। 5 दिन नहीं बीते और कलेक्टर का अपहरण, दो गार्डों की हत्या। अब बताइए, कैसे कमर कस रही है सरकार। ऐसी कई बैठकें पहले भी हो चुकी हैं पर समस्या जस की तस बनी है। सरकार के नाम एक भी बड़ी उपलब्धि नहीं हैं। हां सिर्फ कुछ नाकामियां जरूर मिली हैं। 

दूसरे अधिकारी क्या करेंगे
छत्तीसगढ़ ने हाल ही में 9 नए जिलों का गठन किया है। सभी जगह नए कलेक्टर व अन्य अधिकारी तैनात किए हैं। अब जब कलेक्टर का अपहरण हो रहा है तो अन्य जिलों के अधिकारी क्यों नक्सलियों को चुनौती देंगे। भला मुसीबत क्यों लेगें। क्या इसका जवाब है सरकार के पास। जंगली इलाकों के बीच के ये जिले, जहां सरकारी मदद के पहले नक्सली पहुंच जाते हैं। वहां की सड़कों पर नक्सलियों का कब्जा है। सड़क बनाने वाले ठेकेदार लेवी (एक प्रकार की रिश्वत)  देते हैं, तब वहां काम करते हैं। ऐसे में सरकार का अगला कदम क्या होगा? यह एक बड़ा सवाल है। सरकार को इमानदारी से सेना के माध्यम से एक बड़े अभियान चलाने की जरूरत है, हां और राज्यों को भी केंद्र की मदद करनी होगी। राज्य और केंद्र का समन्वित कार्य ही इस लाल आतंक को समाप्त कर सकता है।

Saturday, January 7, 2012

सावधान

बात 1997 की है। जब मैं चौथी कक्षा में पढ़ता था, गांव का सरकारी स्कूल। शिक्षकों की कमी का दौर था। मेरे गांव के पड़ोसी गांव में तो एक शिक्षक ही था, इसीलिए दोनों गांवों के बच्चे एक साथ पढ़ते थे। हमारे गांव के स्कूल में कक्षाएं एक साथ लगती थीं। एक मासाब थे मिश्रा सर, बड़े ही सख्त, शराब के आदी। एक दिन मैं स्कूल की खिड़की पार कर निकल गया, तब सर को पता चला तो, आव देखा न ताव उलटी हथेली गाल पर रख दी। उनकी सोने की अंगूठी मेरे गाल पर छप गई, जैसे किसी ने सील लगा दी। बस अपन रोते-रोते घर पहुंच गए। मेरी बऊ (दादी) ने ऐसा देखा तो गुस्से से लाल हो गई और पहुंच गर्इं स्कूल। मिश्रा जी को खूब डांट पड़ी। इसके बाद जब मां को जानकारी लगी तो उन्होंने बऊ को समझाया और मुझे धमकाया। कहा, दो बार ऐसी गलती की तो मैं भी मारूंगी।
उस समय शिक्षा का अधिकार कानून लागू नहीं हुआ था। शिक्षक रूल से पिटाई करते थे। बेशरम (एक प्रकार का पौधा)  की छड़ी से पिटाई होती थी। सजा पर रोक नहीं थी। आप सोच रहे होंगे ये आत्मकथा मैं आपको क्यों सुना रहा हूं।
दरअसल भोपाल के एक स्कूल की घटना ने मुझे यह लिखने पर मजबूर कर दिया। लाइब्रेरी में बैठे छात्र जब हू-हल्ला मचा रहे थे तो एक शिक्षक ने उन्हें सजा दे दी। वो भी 500 बार यह लिखवाया कि हम दोबारा अनुशासन नहीं तोड़ेंगे। बेशक बच्चे बहुत छोटे थे। पर माता-पिता को यह मामला बड़ा लगा, अखबार में खबरें छपीं। बाल अधिकार संरक्षण आयोग स्कूल पहुंच गया। आखिर इतनी जरूरत क्या थी। बच्चों को दी गई सजा मामूली थी। शारीरिक भी नहीं। ऐसे में माता-पिता इतने उत्तेजित कैसे हो सकते हैं। क्या बच्चों को सिर में नहीं चढ़ा रहे हैं।
पिछले साल की घटना को ले लें राजधानी के एक प्रतिष्ठित स्कूल जिसका रिजल्ट अब खराब हो गया है, में पढ़ने वाले छात्रों को स्कूल ने टीसी दे दी थी, कारण था वे पढ़ाई के प्रति लापरवाह और अनुशासन को तोड़ने में हमेशा आगे रहते थे। कई बार चेतावनी के बाद भी वे नहीं सुधरे तो स्कूल ने बाहर कर दिया। विवाद कलेक्टर तक पहुंच गया। शिक्षा के अधिकार कानून का भला हो। स्कूल की नहीं चली और बच्चे फिर स्कूल में पहुंच गए। रिजल्ट आया तो मेरिट में कोई भी छात्र नहीं था, एक ऐसे स्कूल से जिसने कई आईएएस दिए हैं।
बच्चों की हरकतों पर नजर न रखने के कारण बच्चों में कई समस्याएं आ रही हैं। ऐसे में बच्चों को अच्छे संस्कार देने का समय आ गया है, नहीं तो इस उम्र में बच्चे क्या सीखेंगे उसके दूरगामी परिणाम दुख भरे हो सकते हैं।
गाजियाबाद के एक स्कूल की घटना है, न्यू ईयर में 10वीं के छात्र-छात्राएं शराब पीते पकड़े गए। ये बच्चे घर से पार्टी मनाने की बात कहकर निकले थे। माता-पिता को क्या पता कि वे क्या कर रहे हैं। ये बच्चे 12-15 साल की उम्र के थे।
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शोध का सच
एक शोध में वैज्ञानिकों ने पाया है कि बच्चे जल्द युवा बनने की चाहत रखते हैं। पर्यावण के बदलने के साथ-साथ बच्चों में सेक्चुअल हार्मोन भी जल्द विकसित हो रहे हैं। बच्चे ब्यॉवफ्रेंड, गर्लफ्रेंड की बातें करते हैं। प्यार के बारे में कुछ पता नहीं, लेकिन पटरी पर कट जाते हैं।  स्कूलों में मस्ती के स्तर को भी पार कर जाते हैं। स्कूलों में मोबाइल फोन ले जाते हैं, ऐसे वैसे नहीं ब्लैकबेरी। एक छात्र जब दूसरे को यह दिखाता है तो उनके अंदर प्रतिस्पर्धा की भावना आती है। पढ़ाई दूर की बात यू-ट्यूब पर वीडियो देखते हैं। अश्लील फिल्में भी देखते हैं। एक कमरे में कैद बच्चे क्या कर रहे हैं। कामकाजी माता-पिता को इसकी जानकारी ही नहीं रहती। ऐसे में बच्चों को इतना सिर में चढ़ाना गलत है। बच्चों के बारे में हमेशा जानकारी लेना पालकों का कर्तव्य होना चाहिए।