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Friday, November 14, 2025

डॉ. मोहन भैया सिर्फ स्कीम नहीं चला रहे, बहनों से वादा निभा रहे, रिश्ता कमा रहे

 

1500 रुपये की 'स्नेह राशि' और विकास की नई इबारत एवं नारी सशक्तिकरण का 'मोहन' मॉडल 

 

प्रसंगवश
डॉ. दीपक राय, भोपाल
दैनिक मीडिया गैलरी
मो. 9424950144
12 नवंबर 2025

Ladli Behna Yojna Money Increase by Dr. Mohan Yadav



लाड़ली बहना योजना महज एक 'स्कीम' नहीं है, बल्कि एक 'रिश्ता' है। यह केवल 1500 रूपये का हस्तांतरण नहीं है, यह एक 'आर्थिक महायज्ञ' है, जिसकी आहुति सीधे प्रदेश की अर्थव्यवस्था की नींव को मजबूत कर रही है। कई कार्यक्रमों में सार्वजनिक रूप से बहनें अपने 'भैया मोहन' का आभार जताते हुए कहती हैं कि "वे ठीक उसी प्रकार हमारा ध्यान रख रहे हैं, जैसे भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी बहन सुभद्रा का ध्यान रखा था।" यह उपमा साधारण नहीं है। यह योजना को सरकारी फाइलों से निकालकर सीधे भारतीय संस्कृति और परिवार के भावनात्मक ताने-बाने से जोड़ देती है। यह 'मुख्यमंत्री' को 'परिवार के मुखिया' या 'बड़े भाई' के रूप में स्थापित करता है, जो अपनी बहनों की आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है...



मध्य प्रदेश के इतिहास के पन्नों में 12 नवंबर 2025 की तारीख एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में जुड़ रही है। यह तारीख केवल कैलेंडर की एक तारीख नहीं, बल्कि यह प्रदेश की 1.26 करोड़ से अधिक बहनों के विश्वास, आशा और सशक्तिकरण के उत्सव का दिन है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, जिन्हें प्रदेश की बहनें स्नेह से 'मोहन भैया' कहती हैं, अपना एक बड़ा वादा पूरा करने जा रहे हैं। 
1000 रूपये महीने से शुरू हुई लाड़ली बहना योजना को 1500 रूपये करने का कीर्तिमान रचने का यह डॉ. मोहन यादव को मिल रहा है। सिवनी का पॉलिटेक्निक कॉलेज मैदान भी उस पल का गवाह बनने वाला है जहां से 'सिंगल क्लिक' के माध्यम से, वे 'मुख्यमंत्री लाड़ली बहना योजना' की 30वीं किस्त के रूप में 1857 करोड़ रुपये की राशि अंतरित होने जा रही है। आज की यह कोई सामान्य किस्त नहीं है। यह वह क्षण है जब योजना की राशि बढ़कर 1500 रुपये प्रति माह हो रही है। यह सिर्फ 250 रुपये की वृद्धि नहीं है; यह एक प्रतिबद्धता का प्रतीक है, जो दर्शाता है कि डॉ. मोहन के लिए 'नारी सशक्तिकरण' केवल एक नारा नहीं, बल्कि एक दृढ़ संकल्प है।

राज्य-स्तरीय कार्यक्रम के लिए सिवनी का चयन अपने आप में एक गहरा संदेश देता है। यह दर्शाता है कि विकास और कल्याण का केंद्र अब केवल राजधानी भोपाल या बड़े महानगरों तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकार की दृष्टि प्रदेश के हर कोने पर समान रूप से है। एक तरफ प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) के माध्यम से नागरिकों का तत्काल आर्थिक सशक्तिकरण, और दूसरी तरफ, बुनियादी ढाँचे (सड़कें, पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा) में निवेश करके दीर्घकालिक विकास को गति देना। यह 'कल्याण' और 'विकास' का एक संतुलित मॉडल है, जिसे डॉ. मोहन यादव की सरकार आगे बढ़ा रही है।
जब 17 दिसंबर 2023 में डॉ. मोहन यादव ने मुख्यमंत्री का पदभार संभाला, तब कुछ लोगों ने इस योजना के भविष्य पर संदेह व्यक्त किया था। लेकिन डॉ. यादव ने न केवल इस योजना को पूरी दृढ़ता से जारी रखा, बल्कि इसे और अधिक मजबूती प्रदान की। राशि को क्रमिक रूप से बढ़ाने का वादा किया गया था, और अब 1500 रुपये की किस्त जारी करके, डॉ. यादव ने यह सिद्ध कर दिया है कि वे अपने पूर्ववर्ती की विरासत को न केवल सहेज रहे हैं, बल्कि उसे एक नया आयाम भी दे रहे हैं।
यह कदम राजनीतिक रूप से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह 'भैया' के वादे की निरंतरता को दर्शाता है, जो प्रदेश की महिलाओं को आश्वस्त करता है कि सरकार बदलने से उनकी प्राथमिकताएँ नहीं बदली हैं।
इस योजना की सफलता का एक बड़ा कारण यह केवल एक 'स्कीम' नहीं है, बल्कि एक 'रिश्ता' है। कई कार्यक्रमों में सार्वजनिक रूप से बहनें अपने 'भैया मोहन' का आभार जताते हुए कहती हैं कि "वे ठीक उसी प्रकार हमारा ध्यान रख रहे हैं, जैसे भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी बहन सुभद्रा का ध्यान रखा था।"
यह उपमा साधारण नहीं है। यह योजना को सरकारी फाइलों से निकालकर सीधे भारतीय संस्कृति और परिवार के भावनात्मक ताने-बाने से जोड़ देती है। यह 'मुख्यमंत्री' को 'परिवार के मुखिया' या 'बड़े भाई' के रूप में स्थापित करता है, जो अपनी बहनों की आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। यह भावनात्मक जुड़ाव ही इस योजना की आत्मा है, जो इसे किसी भी अन्य कल्याणकारी योजना से अलग और अधिक प्रभावशाली बनाता है।

आंकड़ों के आईने में: इस योजना का पैमाना और इसका वित्तीय प्रभाव चकित करने वाला है। 30वीं किस्त को मिलाकर, जून 2023 से अब तक 44,917.92 करोड़ रुपये से अधिक की राशि सीधे महिलाओं के खातों में अंतरित की जा चुकी है। इसमें रक्षा बंधन पर तीन बार दी गई 250 रुपये की विशेष सहायता राशि भी शामिल है। प्रदेश के सभी 52 जिलों में 1 करोड़ 26 लाख 36 हजार से अधिक लाभार्थी, यह संख्या दर्शाती है कि शायद ही कोई ऐसा गरीब या मध्यमवर्गीय परिवार हो, जो इस योजना के सकारात्मक प्रभाव से अछूता हो।

व्यापक पहुंच: इंदौर जिले में सर्वाधिक 4.40 लाख लाभार्थी हैं, तो सागर में 4.19 लाख और रीवा में 4.03 लाख। यह दिखाता है कि योजना ने शहरी और ग्रामीण, दोनों क्षेत्रों में समान रूप से अपनी पैठ बनाई है।
हर कोने तक लाभ: दूसरी ओर, निवाड़ी जैसे छोटे जिले में भी 80 हजार से अधिक बहनें लाभान्वित हो रही हैं। छिंदवाड़ा (3.90 लाख), जबलपुर (3.81 लाख), और ग्वालियर (3.05 लाख) जैसे प्रमुख केंद्रों से लेकर अलीराजपुर (1.23 लाख) और श्योपुर (1.08 लाख) जैसे आदिवासी बहुल जिलों तक, इसका विस्तार अभूतपूर्व है।

आर्थिक आत्मनिर्भरता: 
यह योजना सिर्फ 1500 रुपये देने से कहीं आगे निकल गई है। इसके बहुआयामी प्रभाव स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं। जो आर्थिक स्वतंत्रता से पारिवारिक निर्णय तक फैले हैं। यह राशि महिलाओं को अपनी छोटी-छोटी वित्तीय आवश्यकताओं के लिए किसी पर निर्भर नहीं रहने देती। चाहे वह बच्चों की स्कूल की फीस हो, घर के लिए कोई जरूरी सामान हो, या खुद के लिए दवाइयाँ हों, अब उनके पास अपना पैसा है।
बैंकिंग प्रणाली से जुड़ाव: इस योजना ने लाखों महिलाओं को पहली बार औपचारिक बैंकिंग प्रणाली से जोड़ा है। अपने खाते का संचालन करना, डिजिटल भुगतान सीखना और बचत की आदत डालना, यह एक मूक वित्तीय क्रांति है।
उद्यमिता को बल: कई महिलाओं ने इस राशि का उपयोग 'पूंजी' के रूप में किया है। सिलाई मशीन खरीदना, सब्जी की दुकान लगाना या कोई छोटा-मोटा घरेलू व्यापार शुरू करना—यह पैसा उन्हें 'उद्यमी' बनने का आत्मविश्वास दे रहा है।
पारिवारिक निर्णयों में भूमिका: जब एक महिला आर्थिक रूप से योगदान देती है, तो परिवारिक निर्णयों में उसकी आवाज का वजन बढ़ जाता है। यह योजना महिलाओं के 'सामाजिक सम्मान' को सुदृढ़ कर रही है।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव द्वारा 1500 रुपये की किस्त जारी करना एक वादे को निभाने से कहीं अधिक है। यह 'आत्मनिर्भर मध्य प्रदेश' के निर्माण की दिशा में एक ठोस कदम है। यह इस विश्वास की पुष्टि है कि जब प्रदेश की आधी आबादी (महिलाएं) आर्थिक रूप से सशक्त और आत्मनिर्भर होंगी, तभी राज्य सही मायनों में प्रगति कर सकता है।
लाड़ली बहना योजना अब केवल एक योजना नहीं है; यह मध्य प्रदेश के सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य का एक स्थायी हिस्सा बन चुकी है। यह एक ऐसा 'सुरक्षा कवच' है, जो बहनों को विश्वास दिलाता है कि उनका 'भैया' उनके साथ खड़ा है। सिवनी से जलने वाली यह विकास की लौ, निश्चित रूप से पूरे मध्य प्रदेश को 'आत्मनिर्भरता' के प्रकाश से आलोकित करेगी।
(लेखक डॉ. दीपक राय "MY मध्यप्रदेश" , "सोशल मीडिया राजनीति और समाज" पुस्तक के लेखक हैं।)

जनजातीय गौरव दिवस और मध्य प्रदेश सरकार का संकल्प

 


धरती आबा के सपने और मध्यप्रदेश में किये जा रहे प्रयास

डॉ. दीपक राय, शोध लेखक एवं पत्रकार, मो. 9424950144

Dr. Mohan Yadav Government Work for Tribal Community in Madhya Pradesh


आज, जब हम 'धरती आबा' भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती के समापन वर्ष का उत्सव मना रहे हैं, पूरा देश 'जनजातीय गौरव दिवस' के उल्लास में डूबा है। यह दिवस केवल एक स्मरणोत्सव नहीं, बल्कि उन असंख्य जनजातीय वीरों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने का दिन है, जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति देकर भी इस देश के आत्मसम्मान, संस्कृति और निज गौरव की रक्षा की। मध्य प्रदेश, जो देश की सर्वाधिक जनजातीय आबादी का घर है, इस गौरवगाथा का एक महत्वपूर्ण अध्याय रहा है। यहाँ की धरती रायन्ना, सिद्धो-कान्हू संथाल, बाबा तिलका मांझी, अल्लूरी सीताराम राजू, गुण्डाधुर, सुरेन्द्र साय, अमर शहीद शंकर शाह, रघुनाथ शाह, टंट्या भील, खाज्या नायक, भीमा नायक, और झलकारी बाई जैसे अनगिनत वीरों के शौर्य से सिंचित है। ऐसे में, यह प्रश्न स्वाभाविक है कि इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में, वर्तमान मध्य प्रदेश सरकार अपने जनजातीय समाज के उत्थान के लिए क्या कर रही है? सवा महीने बाद अपने कार्यकाल के दो वर्ष पूरे करने जा रहे मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की सरकार के दृष्टिकोण और कार्यों का विश्लेषण करना समीचीन होगा। डॉ. मोहन यादव सरकार ने अपने कार्यकाल की शुरुआत से ही यह स्पष्ट कर दिया कि जनजातीय कल्याण केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक सम्मान का भी विषय है। सरकार के गठन के बाद जनवरी 2024 में पहली कैबिनेट बैठक वीरांगना रानी दुर्गावती और रानी अवंतीबाई के नाम पर जबलपुर में आयोजित की गई। यह सिलसिला यहीं नहीं रुका; 5 अक्टूबर 2024 को वीरांगना रानी दुर्गावती के जन्म दिवस पर उनकी पहली राजधानी सिंग्रामपुर में कैबिनेट की बैठक कर सरकार ने स्पष्ट संदेश दिया कि जनजातीय नायकों का सम्मान केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि नीतिगत भी है। इसी दिशा में, अलीराजपुर जिले का नाम परिवर्तित कर 'आलीराजपुर' करना, केवल एक नाम परिवर्तन नहीं है, बल्कि यह जनजातीय वर्ग की अस्मिता के सम्मान और उनके सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक है। किसी भी सरकार की प्राथमिकता का सबसे बड़ा प्रमाण उसका बजट होता है। डॉ. मोहन यादव सरकार ने इस मोर्चे पर एक बड़ी लकीर खींची है। बजट को अभूतपूर्व रूप से बढ़ाकर 47 हजार 295 करोड़ रुपये कर दिया गया है। यह पिछले वर्ष की तुलना में 6,491 करोड़ रुपये (15.91%) की भारी वृद्धि है। यह आँकड़ा दर्शाता है कि सरकार कल्याण के लिए 'तन, मन और धन' से जुटी हुई है। यह बढ़ा हुआ बजट 'पीएम जनमन' और 'धरती आबा' जैसी महत्वाकांक्षी योजनाओं को गति दे रहा है, जिनका सीधा लक्ष्य विशेष रूप से पिछड़ी और कमजोर जनजातियों जैसे बैगा, भारिया, सहरिया का समग्र विकास करना है।

जनजातीय समाज के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुँच रही है। सरकार ने इसे मिशन मोड में लिया है। मध्य प्रदेश के सभी 89 जनजातीय विकासखंडों में 'सिकलसेल हीमोग्लोबिनोपैथी मिशन' लागू किया गया है। यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सिकल सेल एनीमिया इस समुदाय में एक बड़ी स्वास्थ्य चुनौती रही है। अब तक एक करोड़ से अधिक सिकल सेल स्क्रीनिंग एवं काउंसिलिंग कार्ड वितरित किया जाना एक बड़ी उपलब्धि है।


इसके अतिरिक्त, दूर-दराज के अंचलों तक स्वास्थ्य सेवाएँ पहुँचाने के लिए 21 जिलों में 66 मोबाइल मेडिकल यूनिट्स (एमएमयू) संचालित हैं। 'आहार अनुदान योजना' के तहत विशेष पिछड़ी जनजातियों की महिला मुखिया को 1,500 रुपये प्रतिमाह पोषण आहार अनुदान देना, सीधे तौर पर मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य में सुधार ला रहा है। 'पीएम जन-मन कार्यक्रम' के अंतर्गत आंगनवाड़ी भवनों के निर्माण में मध्य प्रदेश का देश में पहले स्थान पर होना इसी प्रतिबद्धता को दिखाता है।

किसी भी समाज के उत्थान की कुंजी शिक्षा में निहित है। डॉ. मोहन यादव सरकार ने जनजातीय विद्यार्थियों के लिए अवसरों का एक नया पारिस्थितिकी तंत्र तैयार किया है। इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण जेईई और नीट जैसी कठिन परीक्षाओं में जनजातीय विद्यार्थियों का प्रदर्शन है। 2024-25 में जेईई मेंस में 51, जेईई एडवांस्ड में 10 और नीट में 115 विद्यार्थियों का उत्तीर्ण होना एक क्रांति से कम नहीं है, खासकर तब जब 2022-23 तक यह आंकड़ा मात्र 2 था। इस प्रदर्शन ने मध्य प्रदेश को देश की रैंकिंग में दूसरे स्थान पर ला दिया है। इस सफलता के पीछे एक विशाल ढाँचा काम कर रहा है। प्रदेश में 34,557 शैक्षणिक संस्थाएं (प्राथमिक शाला, आश्रम, छात्रावास, एकलव्य विद्यालय आदि) संचालित हैं। छात्रावासों में अब 10 माह के स्थान पर 12 माह की शिष्यवृत्ति दी जा रही है। 'आकांक्षा योजना' और 'रानी दुर्गावती प्रशिक्षण अकादमी' (जहाँ फ्री कोचिंग दी जाएगी) जैसी पहलें यह सुनिश्चित कर रही हैं कि प्रतिभा को संसाधनों की कमी का सामना न करना पड़े। सबसे महत्वपूर्ण, भगवान बिरसा मुंडा जी की जीवनी और अन्य वीर नायकों की शौर्य कथाओं को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल करने की पहल, नई पीढ़ी में अपनी जड़ों के प्रति गर्व का भाव भर रही है।

जनजातीय समाज की आत्मा 'जल, जंगल और जमीन' से जुड़ी है। देशज संस्कृति को संरक्षित रखने और ग्राम सभाओं को सशक्त बनाने में 'पेसा नियमों' ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। अब जनजातीय ग्राम सभाओं को अपने जैविक संसाधनों, भूमि और पारम्परिक व्यवस्थाओं पर वास्तविक अधिकार प्राप्त हुए हैं। वे अपने गांवों की विकास योजनाएं खुद बना रही हैं, जिससे जनजातीय अंचलों में 'स्वशासन' का एक सशक्त आधार स्थापित हुआ है। आजीविका के मोर्चे पर, लाखों तेंदूपत्ता संग्राहकों का पारिश्रमिक बढ़ाकर 4,000 रुपये प्रति मानक बोरी करना एक बड़ा आर्थिक संबल है। वहीं, 'शौर्य संकल्प योजना' के तहत बैगा, भारिया एवं सहरिया के लिये अलग बटालियन गठित करने की प्रक्रिया, उन्हें राष्ट्र सेवा में एक विशिष्ट अवसर प्रदान कर रही है।

भगवान बिरसा मुंडा ने 'उलगुलान' का आह्वान जल, जंगल, जमीन और अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए किया था। आज, डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में मध्य प्रदेश सरकार उसी आह्वान को एक नए संदर्भ में जी रही है। यह सरकार केवल कल्याणकारी योजनाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जनजातीय समाज के 'सम्मान', 'सशक्तिकरण' और 'स्वशासन' पर केंद्रित है। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की सरकार, जनजातीय समुदाय के कल्याण के साथ-साथ सांस्कृतिक रूप से संपन्न और समृद्ध मध्य प्रदेश की उस नींव का निर्माण कर रही है, जिसका सपना 'धरती आबा' ने देखा था।


Sunday, March 8, 2020

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